तीर्थ यात्राओं पर जाने से पूर्व, कैसे करें तैयारियां (मनोज जैन नायक, मुरैना की कलम से)

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मुरैना (मनोज जैन नायक) जैन दर्शन भावना प्रधान धर्म है । जैसे आपके भाव होंगे, जैसे आपके विचार होगें, जैसी आपकी अंतरंग की सोच होगी, वैसे ही आपको परिणामों की प्राप्ति होगी । आप तीर्थ पर होते हुए भी सांसारिक क्रियाकलापों में लगे हुए हैं, एक दूसरे की चुगली कर रहे हैं, दूसरों का उपहास उड़ा रहे है, अनर्गल हंसी मजाक कर रहे हैं, फालतू की चर्चाएं कर रहे हैं अथवा अनर्गल फैशन के साथ अमर्यादित पहनावे का उपयोग कर रहे हैं तो तीर्थ यात्रा आपको सकारात्मक परिणाम नहीं देगी । हम जा तो रहे हैं पुण्यार्जन करने लेकिन अनजाने में पाप कर्म का संचय कर बैठते हैं।
जैन तीर्थयात्रा की तैयारी का मतलब केवल सामान पैक करना नहीं, बल्कि मन, वचन और काया से शुद्ध होकर, आध्यात्मिक रूप से खुद को तैयार करना है । ताकि तीर्थों की पवित्रता का पूर्ण लाभ प्राप्त किया जा सके। तीर्थ क्षेत्रों में आत्मसंयम तथा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन अवश्यक रूप से करना चाहिए । हमारे शास्त्रों, ग्रंथों में लिखा है कि सांसारिक प्राणियों द्वारा जाने अनजाने में किये गए पापों का क्षरण तीर्थयात्रा करने पर नष्ट हो जाता है, लेकिन तीर्थयात्रा में किए हुए पापों का क्षरण कहीं भी नष्ट नहीं होता है। इसलिए तीर्थयात्रा के दौरान हमेशा प्रभु की पूजन, भक्ति, उपासना, ध्यान, तप, जाप और धर्म के क्रियाकलापों में ही सलंग्न रहना चाहिए ।
तीर्थ यात्राओं पर जाते समय जोखिम का कीमती सामान न ले जाएं । मौसम के हिसाब से कपड़े, अपनी रोजमर्या की आवश्यक दवाएं, अपना टिकिट। ओरिजनल आधार कार्ड/वोटर कार्ड या कोई अन्य पहचान पत्र एवं एक ताला चाबी आवश्यक रूप से साथ लेकर चलें । जहां तक संभव हो गोला, नारियल, अक्षत, घी, दीपक, बाती एवं अन्य पूजन सामग्री अपने घर से ही ले जाने का प्रायस करें ।
यदि कोई सामूहिक तीर्थ यात्रा जा रही है तो आप उसमें आयोजकों की बिना स्वीकृति के अनाधिकृत रूप से सम्मिलित न हो । देखा जाता है कि कुछ लोग आयोजकों को तो सूचित नहीं करते हैं और अलग से टिकिट लेकर यात्रा करते हैं। तीर्थों पर पहुंचकर उसी समूह में सम्मिलित होकर उनकी सभी सुविधाओं का अनुचित रूप से लाभ उठाते हैं, जो कि सरासर गलत है । आयोजक अपनी यात्री संख्या के हिसाब से सभी सुविधाएं जुटाते हैं। आपके अनाधिकृत रूप से उसमें सम्मिलित होने से उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।
तीर्थ यात्रा पर जाने से पूर्व आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों तरह की तैयारियां करना आवश्यक हैं । जिसमें मानसिक शुद्धि, आत्मसंयम, अहिंसा, और पवित्र स्थलों के नियमों का पालन मुख्य हैं । तीर्थ स्थलों पर रात्रि भोजन न करें, चमड़े की वस्तुओं और हिंसात्मक सौंदर्य सामग्री का उपयोग न करें, शुद्ध एवं सादा भोजन करें, अहंकार त्याग कर विनम्रता धारण करें, अपशब्द न बोलें, छल, कपट एवं मायाचारी से दूर रहें, आधुनिक, भौतिक सुख सुविधाओं का कम से कम उपयोग करें, किसी भी बात पर गुस्सा न करें, भोजनादि में कोई कमी न निकालें, क्षेत्र पर निर्धारित नियमावली अथवा आयोजकों द्वारा दिए गए सभी निर्देशों का पालन करें । अन्य सभी यात्रियों के साथ आत्मीय एवं समता भाव रखें । तीर्थ वंदना हमें सदैव शुद्ध मन एवं शुद्ध भावों से करना चाहिए । ताकि पुण्यार्जन कर आत्मा को शुद्ध किया जा सके और मोक्ष मार्ग की ओर आगे बढ़ा जा सके ।
तीर्थ यात्रा को तीर्थ यात्रा के रूप में ही स्वीकार करें । यात्रा पर जाने से पूर्व ही मन को निर्मल एवं शांत रखने का प्रयास करें । घरेलू प्रपंच, पारिवारिक मोह, व्यापारिक समस्याओं को घर पर छोड़ने का प्रयास करें । घूमने फिरने वाली पिकनिक यात्राओं और तीर्थ यात्राओं के अंतर को अंतरंग से स्वीकार करें । पिकनिक वाली यात्रा मौजमस्ती और खाने पीने के लिए होती है जबकि तीर्थ यात्रा मन की शांति, मन की निर्मलता, आत्म शुद्धि और मोक्ष मार्ग की ओर गमन करने के लिए की जाती है ।
लेखक -मनोज जैन नायक, मुरैना

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