जैन धर्म में जीने की कला है तो मरने की भी कला उपलब्ध है वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव

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वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि अनादि काल से जीव आत्मआचरण नहीं कर पाया।
हम उन्हीं को मुनि कहते हैं जो समस्त कलाओ से युक्त होते हैं। 72 कलाओं में दो श्रेष्ठ कलाएं हैं पहली जीव की जीविका दूसरी जीव का उद्धार अर्थात आत्मा को परमात्मा बनाना। जैन धर्म में जीने की भी कला है तथा मरने की भी कला है। जो दुष्ट काम अश्लील काम करते हैं वह साधु नहीं तथा श्रावक भी नहीं। जो स्वयं की आत्मा पर विजय प्राप्त करते हैं वह वीरों के भी वीर होते हैं। वे पुरुष धीर वीर चमकती हुई क्षमा की तलवार से इंद्रियों का दमन करके कर्मों पर विजय प्राप्त करते हैं कषाओ रूपी योद्धाओं को वह जीत लेते हैं। वे भगवान धन्य है जिन्होंने दर्शन ज्ञान रूपी हाथ का सहारा देकर भव्य जीवो का उद्धार किया है। मोह रूपी लता को ज्ञान रूपी शस्त्रों से मुनिराज नष्ट कर देते हैं। जिस प्रकार आकाश में तारों से गिरा हुआ चंद्रमा सुशोभित होता है इस प्रकार गुणो रुपी ताराओ के समूह में मुनिराज सुशोभित होते हैं।
विशुद्ध भाव से युक्त जीव चक्रवर्ती राजा महाराजा देवेंद्र बलभद्र राम केशव सुर, चारण रिद्धी थारी मुनी, जिनेंद्र आदि श्रेष्ठ पद प्राप्त करते हैं। यह अष्ट पाहुड़ की 162 नंबर की गाथा से आचार्य श्री ने बताया.। गृहस्थ धर्म, मुनि धर्म पालन में भाव प्रमुख है। जिनेंद्र भाव की भावना से सुशोभित जीव उत्तम अनुपम आनंद सहित अतुलनीय पद को प्राप्त करते हैं।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता कब मम अपूर्व अवसर आएगा द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारियां श्रीमती
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।
– अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट

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