गणिनी गुरु मां विशुद्धमति माताजी का 77 वा अवतरण दिवस संपन्न दो दिवसीय आयोजन में श्रद्धा भक्ति समर्पण का उमड़ा सैलाब

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कोटा
नाम विशुद्ध चरित्र विशुद्ध और विशुद्धता की धारी है गुरु माँ विशुद्धमति के चरणों में शत शत नमन हमारी है जी हा । मैं राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार कोटा बात कर रहा हूं गुरु मां गणिनी आर्यिका 105 श्री विशुद्धमती माताजी का 77 वा अवतरण दिवस की । जिसका हमें था इंतजार जिसके लिए था मन बेकरार वो घड़ी आ गई आ गई । परम पूजनीय भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 श्री विशुद्धमती माताजी का 77 वा अवतरण दिवस दो दिवसीय आयोजन के साथ मंगलवार सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में हर्षौल्लास पूर्ण वातावरण संपन्न हो गया।मंगलवार की सुबह की बेला से ही भक्तों का आना शुरू हो गया था गुरु मां की एक झलक पाने एवम उनका आशीष लेने वालों की कतार लगी रही।
सुबह की बेला में आयोजन के क्रम मे सर्वप्रथम पूर्वाचार्यों को नमन करते हुए अर्घ्य समर्पित किए गए इसके उपरांत गुरु मा की रजत द्रव्य समर्पित करते हुए भक्ति नृत्य करते हुए भक्ति उल्लास के साथ पूजन किया गया। पूजन की बेला में सभी भक्त भक्ति से सराबोर हो गए।
इस आयोजन में परम पूज्य गणिनी आर्यिका 105 विभा श्री माताजी का भी संघ सानिध्य प्राप्त हुआ। दोपहर की बेला में तलवंडी जैन मंदिर से शोभायात्रा निकाली गई जो कार्यक्रम स्थल एलेन सत्यार्थ परिसर पहुंची इसकी विशेषता यह रही कि इसमें गुरु मां केसाथ 25 पिच्छीकाधारी संघ शामिल हुए। तलवंडी चौराहा होते हुए जवाहर
नगर स्थित सत्यार्थ एलन परिसर पहुंची।महिला शक्ति हाथों में धर्म ध्वजा लिए जयकारे लगाते हुए चल रही थी। बैंड-बाजों की धुन पर भक्ति नृत्य करते हुए श्रद्धालुओं ने पूरे मार्ग को भक्ति रस से भर दिया। अनुभव की पूंजी, विभाश्री सत्यार्थ परिसर में आयोजित विनयांजली सभा में आर्यिका विभाश्री कहा कि साधु
जितना पुराना और अनुभवी होता है, समाज
के लिए उतना ही उपयोगी होता है। वहीं,
विशुद्धमति माता ने कहा कि पंचमकाल में
संघ का संचालन एक बड़ी चुनौती है, जिसे
संयम से ही साधा जा सकता है।
उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि जीवन का
77 वर्ष का समय बीत गया, अब लक्ष्य प्रभु
से पूर्ण मिलन का होना चाहिए। पट्टगणिनी
आर्यिका विज्ञमति माताजी ने गुरु मां की
तुलना चंदन के वृक्ष से करते हुए उनके प्रभाव
को अक्षुण्ण बताया। उन्होंने कहा माताजी विराट व्यक्तित्व की धनी है। वे विनयऔर विवेकवान है असाधारण व्यक्तिव फ़िर भी साधारण सी दिखती हैं।
उन्होंने महावीरकीर्ति महाराज को स्मृति लाते हुए कहा उन्होंने माताजी के लिए कह दिया था माया की मां रोको मत ये दिव्य साधिका है। माताजी ने संघ को संभाला।
आचार्यश्री सन्मति सागर जी महाराज के साथ गुरु मां का वर्षायोग 1992 मे हुआ। आज आज भी उनका वरदहस्त है। उन्होंने कहा कम बोलना अधिक करना गुरु मा का व्यक्तित्व है।
पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार कोटा (राज)

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