पर्यावरण पुकारे : अब भी समय है!
: डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर 9793821108
हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उसके संरक्षण हेतु सामूहिक प्रयासों को प्रेरित करने का एक वैश्विक अवसर है। 2025 में जब हम इस दिवस को मना रहे हैं, तब पर्यावरणीय संकट पहले से कहीं अधिक गंभीर रूप ले चुका है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता की क्षति और संसाधनों का अत्यधिक दोहन मानवता के सामने खड़ी प्रमुख चुनौतियाँ हैं। यह दिवस हमें न केवल पर्यावरणीय संकटों की याद दिलाता है, बल्कि यह भी प्रेरित करता है कि हम किस प्रकार धरती माता की रक्षा कर सकते हैं।
इस वर्ष, विश्व पर्यावरण दिवस 2025 का थीम है: “विश्व स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण का अंत”। यह प्लास्टिक कचरे की गंभीर समस्या से निपटने का एक वैश्विक संकल्प है। हर साल 430 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग दो-तिहाई केवल एक बार उपयोग के लिए होता है और जल्दी ही फेंक दिया जाता है। यह अल्पकालिक उपयोग की वस्तुएं नदियों और महासागरों को प्रदूषित करती हैं, हमारी फूड चेन में प्रवेश कर जाती हैं, और माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे शरीर में भी जमा हो जाती हैं।
5 जून – यह दिन हर वर्ष हमें प्रकृति के साथ हमारे संबंध की स्मृति कराता है। यह दिन केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं, बल्कि चेतना का एक विस्तार है – एक सामूहिक प्रतिज्ञा कि हम अपनी धरती के साथ हिंसा नहीं, सह-अस्तित्व का संबंध रखेंगे।
महात्मा गांधी ने कहा था कि “पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा कर सकती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।” ऋग्वेद में कहा कि “पृथ्वी हमारी माता है, हम इसके पुत्र हैं।” थॉमस फुलर का कहना है कि-“हम तब तक पानी की कीमत नहीं समझते जब तक कुआं सूख न जाए।” जैन दर्शन में बताया है कि “पर्यावरण की रक्षा करना अहिंसा की सबसे सच्ची साधना है।”
वर्तमान पर्यावरणीय परिदृश्य: संकट की आहटहम जिस विकास की दौड़ में हैं, वह कहीं न कहीं प्रकृति के विनाश से जुड़ी हुई है। उदाहरण स्वरूप वनों की अंधाधुंध कटाई से वर्षा चक्र असंतुलित हो गया है। औद्योगीकरण और वाहन उत्सर्जन ने वायु को विषैला बना दिया है। प्लास्टिक कचरा और केमिकल्स ने नदियों और समुद्रों को दूषित कर दिया है। तेज़ी से हो रहे शहरीकरण ने भूमि उपयोग का संतुलन बिगाड़ दिया है।परिणामस्वरूप – प्राकृतिक आपदाएँ, जल संकट, तापमान वृद्धि, जैव विविधता का विनाश और महामारी जैसी स्थितियाँ लगातार बढ़ रही हैं।
नदियाँ भी अब बहते-बहते थक गईं,
जंगलों की चीखें भी अब चुप रह गईं।
कृत्रिम विकास की अंधी इस दौड़ में,
हम अपनी जड़ें ही खुद से काट गए हैं कहीं।।
क्या करें हम? – समाधान की दिशा में व्यावहारिक पहल : पर्यावरणीय संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं, बल्कि जन-सहयोग से ही संभव है। निम्नलिखित क्रियाएं प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है: व्यक्तिगत स्तर पर: घर के आसपास कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएँ और उसे जीवित रखें।बिजली और पानी की बर्बादी को रोकें। एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक (Single-use plastic) से परहेज़ करें। अपने वाहन का प्रयोग कम करें, कारपूल या सार्वजनिक परिवहन को अपनाएँ।
सामाजिक स्तर पर: सामूहिक सफाई अभियान और वृक्षारोपण कार्यक्रम में भाग लें। स्कूलों व समाज में पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा दें। बच्चों को प्रकृति प्रेम की प्रेरणा दें – उन्हें “प्रकृति मित्र” बनाएँ।
प्रौद्योगिकी और अनुसंधान के स्तर पर: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैविक ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग करें।जल पुनर्चक्रण और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दें।इको-फ्रेंडली टेक्नोलॉजी में निवेश करें।
भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण संरक्षण : प्राचीन भारतीय ग्रंथों में प्रकृति के साथ गहन जुड़ाव की अवधारणाएँ हैं।भारत की परंपरा में प्रकृति को ईश्वरतुल्य माना गया है। ‘वृक्ष देवता’ से लेकर ‘नदी माँ’ तक की अवधारणाएँ यही दर्शाती हैं कि भारतीय जीवनदर्शन में पर्यावरण संरक्षण सदैव एक प्रमुख स्थान पर रहा है। ऋग्वेद, उपनिषद और जैन तथा बौद्ध साहित्य में प्रकृति के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व का स्पष्ट वर्णन मिलता है। वेदों में पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश – इन पंचमहाभूतों की पूजा की जाती है। जैन दर्शन में अहिंसा का विस्तार केवल जीवों तक ही नहीं, पर्यावरण तक है। जैन दर्शन कहता है कि जल, वायु, पृथ्वी और वनस्पति सभी में जीव हैं, इसलिए उनका दुरुपयोग पाप है। संयमित जीवनशैली ही पर्यावरण की रक्षा कर सकती है।‘अहिंसा परमो धर्म:’ का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ हिंसा नहीं, सहजीवन आवश्यक है। तीर्थंकरों ने वृक्षों के नीचे ध्यान कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। जैन मुनि पर्यावरण संरक्षण के जीते-जागते उदाहरण हैं। गौतम बुद्ध ने पेड़ों के नीचे ध्यान करते हुए प्रकृति की पूजा का मार्ग दिखाया। तीर्थंकरों ने “परिग्रह परिमाण” की अवधारणा द्वारा उपभोग सीमित करने की शिक्षा दी।
धर्म और पर्यावरण – एक अभिन्न संबंध : भारतीय पूजा-पद्धतियों में तुलसी, पीपल, नीम, गंगा जल आदि का धार्मिक महत्व केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी दृष्टिकोण से भी वैज्ञानिक है। जैन मुनियों की ‘पदयात्रा’, भोजन में चयनशीलता, मौन और अपरिग्रह जैसे नियम – पर्यावरण के अत्यधिक दोहन से बचाने के उत्कृष्ट उपाय हैं।विश्व पर्यावरण दिवस 2025 की प्रासंगिकता: उजड़े हुए जंगलों को पुनः बसाना। नदियों को स्वच्छ करना। मिट्टी की उर्वरता लौटाना। समुद्री तटों की रक्षा करना। यह सब मिलकर पृथ्वी को एक बार फिर हरित, स्वच्छ और संतुलित बना सकते हैं।
प्रेरक तथ्य (2025 के परिप्रेक्ष्य में): संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हर वर्ष 10 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो रहा है। विश्व में प्रति मिनट 1 ट्रक प्लास्टिक समुद्र में गिर रहा है। वर्ष 2025 तक 2 अरब लोगों को स्वच्छ जल नहीं मिलेगा, यदि यही स्थिति रही।निष्कर्ष : अब नहीं तो कभी नहीं। पृथ्वी हमसे कुछ नहीं माँगती, वह केवल संरक्षण चाहती है। अब समय आ गया है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को पुनः परिभाषित करें। प्रगति का अर्थ विनाश नहीं, सतत विकास है। विश्व पर्यावरण दिवस हमें एक ऐसा ही सतत और संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। पर्यावरण बचाने की शुरुआत हमारे घर की चौखट से होती है।
विश्व पर्यावरण दिवस एक स्मरण है – प्रकृति हमें जीवन देती है, अब हमारा कर्तव्य है कि हम उसे बचाएँ। हम सभी को यह शपथ लेनी होगी कि व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर हम पर्यावरण के रक्षक बनेंगे।
क्योंकि स्वस्थ पर्यावरण ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है। विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि यह एक संकल्प दिवस होना चाहिए। हमें आज ही यह प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम पर्यावरण के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझेंगे, प्रकृति से मित्रता करेंगे, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर, सुरक्षित और समृद्ध धरती छोड़ेंगे।
“धरती है धरोहर, न इसे करो बर्बाद,संरक्षण में ही है इसका असली संवाद।” 















