वर्तमान संदर्भ में भगवान महावीर के अहिंसा सिद्धांत की प्रासंगिकता
(महावीर की 2625वीं जयंती 30 मार्च 2026 पर विशेष)
डॉ. सुनील जैन संचयआज का वैश्विक परिदृश्य गहन चिंता का विषय बन गया है। विज्ञान और तकनीक की अभूतपूर्व ऊँचाइयों को छू लेने के पश्चात भी मानव का अंतर्मन असंतुलित और अस्थिर दिखाई देता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, इज़राइल-गाज़ा संघर्ष तथा विभिन्न देशों के मध्य बढ़ते तनाव इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि भौतिक प्रगति के बावजूद मनुष्य ने आंतरिक शांति को कहीं खो दिया है। ऐसे संक्रमणकाल में भगवान महावीर का अहिंसा-संदेश केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं, बल्कि वैश्विक नीति का आधार बनने की क्षमता रखता है।
भगवान महावीर, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर, वैशाली के कुंडग्राम में जन्मे। वर्धमान से महावीर बनने की उनकी यात्रा आत्मसंयम, तप और ज्ञान की चरम परिणति का प्रतीक है। बारह वर्षों की कठोर साधना के पश्चात उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया और मानवता को अहिंसा, अनेकान्तवाद, सत्य एवं अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों का अमूल्य उपहार प्रदान किया।
शुद्ध भावों का अनुभव ही अहिंसा है: महावीर स्वामी की मूल शिक्षा अहिंसा है। सुप्रसिद्ध जैनाचार्य आचार्य अमृतचंद्र ने हिंसा और अहिंसा के विवेक को सूत्ररूप में अत्यंत सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया है—
“अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति।
तेषामेवोत्पत्तिर्हिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः॥”
अर्थात् रागादि विकारों का अभाव अहिंसा है और उनका उदय ही हिंसा है—यही जिनागम का सार है।
जैन सिद्धांत में कहा गया है—
“प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा”
अर्थात् प्रमादयुक्त प्रवृत्ति से प्राणों का हरण करना ही हिंसा है। यहाँ ‘प्रमत्तयोग’ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि जहाँ प्रमाद (असंयम, असावधानी, कषाय) है, वहाँ भले ही प्रत्यक्ष प्राणघात न हो, फिर भी हिंसा का अस्तित्व माना जाएगा।
अहिंसा का व्यापक स्वरूप : अहिंसा का सामान्य अर्थ केवल हत्या न करना या दंड न देना नहीं है। इसका वास्तविक और व्यापक अर्थ है—किसी भी प्राणी को तन, मन, वचन और कर्म से किसी प्रकार की पीड़ा न पहुँचाना।
मन में किसी के प्रति अहित की भावना न रखना, वाणी से कटु शब्दों का प्रयोग न करना तथा कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न देना—यही अहिंसा का सच्चा स्वरूप है।
यदि अहिंसा को केवल “हिंसा का अभाव” मान लिया जाए, तो यह उसकी अत्यंत सीमित व्याख्या होगी। महावीर के चिंतन में अहिंसा एक सजीव, जाग्रत और सक्रिय चेतना है, जो मनुष्य के भीतर करुणा, संवेदना और सह-अस्तित्व की भावना का संचार करती है।
मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म भाव—जैसे क्रोध, द्वेष और ईर्ष्या—अहिंसा के सबसे बड़े शत्रु हैं। ये भाव अदृश्य होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली होते हैं और धीरे-धीरे वाणी एवं कर्म के माध्यम से प्रकट होकर व्यापक हिंसा का रूप धारण कर लेते हैं। इसीलिए महावीर ने अहिंसा की स्थापना मन के स्तर से प्रारंभ की।
वाचिक संयम और आधुनिक संदर्भ : आज के डिजिटल युग में वाणी की अहिंसा का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। शब्दों की तीक्ष्णता तलवार से भी अधिक घातक हो सकती है। सोशल मीडिया पर फैलती कटुता, अपमान और वैमनस्य इस तथ्य का प्रमाण हैं कि वाचिक हिंसा किस प्रकार समाज को विभाजित कर रही है।
जब तक मन और वाणी संयमित नहीं होंगे, तब तक कर्मों में अहिंसा का सच्चा स्वरूप संभव नहीं है।
महावीर की अहिंसा: शूरवीरों की अहिंसा : भगवान महावीर की अहिंसा शूरवीरों की अहिंसा है, कायरों की नहीं। पलायनवादी और भीरु व्यक्ति कभी अहिंसक नहीं हो सकता। अहिंसा की साधना के लिए अभय (निर्भयता) का होना अनिवार्य है।
महावीर की अहिंसा आत्मसंयम की चरम अभिव्यक्ति है—इंद्रियों और मन पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची वीरता है। उन्होंने जो अहिंसा का सिद्धांत प्रस्तुत किया, वह राष्ट्र को निर्बल बनाने वाला नहीं, बल्कि उसे सशक्त, संगठित और संतुलित बनाने वाला था।
प्राणी मात्र के प्रति तादात्म्य : महावीर के अनुसार सच्चा अहिंसक वही है, जो समस्त जीवों के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है, जो सभी को अपने समान समझता है। उनकी दृष्टि में केवल जीव-हत्या ही हिंसा नहीं है, बल्कि किसी के प्रति बुरा विचार रखना भी हिंसा है। अतः व्यवहारिक जीवन में हमें ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिए, जो दूसरों के लिए प्रतिकूल हो। “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”—यह सिद्धांत अहिंसा का व्यावहारिक रूप है।
अनेकांतवाद: वैचारिक अहिंसा का मार्ग : अनेकांतवाद महावीर के अहिंसा-सिद्धांत का बौद्धिक विस्तार है। यह हमें सिखाता है कि सत्य बहुआयामी है और किसी एक दृष्टिकोण से पूर्णतः ग्रहण नहीं किया जा सकता। आज विश्व में जो वैचारिक संघर्ष, धार्मिक कट्टरता और मानसिक आतंकवाद देखने को मिल रहा है, उसका समाधान अनेकांतवाद में निहित है। जब हम दूसरे के दृष्टिकोण को स्वीकारते हैं, तभी वैचारिक हिंसा समाप्त होती है।
अहिंसा और वर्तमान युद्ध : आज के युद्ध केवल सीमाओं के नहीं, बल्कि विचारों और अहंकार के संघर्ष हैं। इन युद्धों में निर्दोष मानवता सबसे अधिक पीड़ित होती है। भगवान महावीर का संदेश स्पष्ट है कि हिंसा किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। यह केवल नए संघर्षों को जन्म देती है। यदि राष्ट्र संवाद, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान के साथ अहिंसा के मार्ग को अपनाएँ, तो युद्धों का अंत संभव है।
अपरिग्रह: अहिंसा का व्यावहारिक आधार : अपरिग्रह का अर्थ है—आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। अधिक संग्रह ही संघर्ष और हिंसा का मूल कारण बनता है। आज का उपभोक्तावादी समाज इसी प्रवृत्ति का परिणाम है। यदि मनुष्य संतोष और संयम को अपनाए, तो अहिंसा का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो सकता है।
अहिंसा: व्यक्तिगत साधना से वैश्विक समाधान तक : अहिंसा का आरंभ व्यक्ति के भीतर से होता है। जब एक व्यक्ति अपने विचारों को शुद्ध करता है, तो उसका प्रभाव परिवार, समाज और राष्ट्र तक पहुँचता है।
तीर्थंकर महावीर के प्रत्येक उपदेश में अहिंसा निहित है। उन्होंने अहिंसक क्रांति के माध्यम से विश्वबंधुत्व और विश्वशांति का मार्ग प्रशस्त किया। यदि मानसिक हिंसा का शमन हो जाए, तो बाह्य हिंसा स्वतः समाप्त हो सकती है।
आत्मविजय ही परम विजय : भगवान महावीर ने कोई युद्ध नहीं किया, फिर भी वे महावीर कहलाए। उन्होंने दूसरों को नहीं, बल्कि स्वयं को जीता।
“जो सहस्रों को युद्ध में जीतता है, वह सच्चा विजेता नहीं; जो स्वयं को जीत लेता है, वही परम विजेता है।”
यद्यपि युद्ध कियो नहीं, नाहि रखे असि-तीर।
परम अहिंसक आचरण, तदपि बने महावीर।।
भगवान महावीर का सिद्धांत “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” यह उद्घोष करता है कि समस्त जीवन परस्पर जुड़ा हुआ है। भगवान महावीर की 2625वीं जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक चेतना का आह्वान है। आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि महावीर का पुनर्जन्म हो, बल्कि यह है कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में पुनः जीवित करें।
आज जब विश्व हिंसा के अंधकार में भटक रहा है, तब महावीर का अहिंसा-संदेश एक प्रकाश-स्तंभ की भाँति हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। अहिंसा ही वह शक्ति है, जो मानव को मानव बनाती है और विश्व को एक परिवार में परिवर्तित कर सकती है।
डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर(लेखक एवं चिंतक)
9793821108












