युवा पीढ़ी में कुंवारापन समाज में चिंतनीय विषय। विजय कुमार जैन राघौगढ़

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युवा पीढ़ी में कुंवारापन समाज में चिंतनीय विषय।
विजय कुमार जैन राघौगढ़
पाश्चात्य संस्कृति की अंधी दौड़ में भारत में युवा पीढ़ी ने अनेक कुरीतियों को उत्साह से अपनाया है। इन कुरीतियों में एक कुरीति कुंवारापन भी है। प्रेम विवाह, लाइव एंड रिलेशनशिप, सह शिक्षा, क्लवों में ऑल नाइट पार्टी आदि के साथ-साथ युवा पीढ़ी ने अब कुंवारेपन में भी जीवन को मुस्कान भरा बना लिया है। सरकार द्वारा विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 वर्ष एवं लड़के की उम्र 21 वर्ष निर्धारित की गई है। यह नियम सरकार ने इसलिये लागू किया कि पूर्व में राजस्थान आदि प्रांतों अक्षय तृतीया को सामूहिक विवाह सम्मेलनों में छोटी उम्र में ही विवाह कर दिए जाते थे। भारत सरकार कार द्वारा विवाह के लिये जो उम्र निर्धारित की है वह हर दृष्टि से उपयुक्त है।हम विचार करें तो विवाह के लिये यह कुंवारेपन का विस्फोट, समाज अंधी दौड़ में कहाँ पहुँच रहा है ?अब वक्त आ गया है कि चीज़ों को मीठे शब्‍दों में कहना बंद किया जाए।दुनिया जिस आज़ादी की जय-जयकार कर रही है, वही आज़ादी धीरे-धीरे परिवार, रिश्तों, और सामाजिक संतुलन,सब कुछ निगलने लगी है। पदम श्री डॉक्टर सुरेश आडवाणी देश के सुप्रसिद्ध कैंसर विशेषज्ञ हैं आप बोन मेरो ट्रांसप्लांट करने वाले आंकोलॉजिस्ट हैं। आप अभी तक एक लाख से अधिक कैंसर पीड़ितों का इलाज कर चुके हैं डॉक्टर सुरेश आडवाणी ने गत दिनों रायपुर में कहा है देर से शादी से ब्रेस्ट कैंसर 10 गुना बढ़ा है। युवक युवती की शादी 22- 23 वर्ष में और 25 वर्ष में पहला बच्चा पैदा करना जरूरी है। इससे ब्रेस्ट कैंसर का खतरा कम होता है। एक ओर साधु संत एवं समाज के प्रबुद्ध जन यह जागरूकता अंकअभियान चला रहे हैं कि समाज की जनसंख्या बढ़ाने के लिए तीन संतान पैदा करें। दूसरी ओर युवक युवती कुंवारेपन में ही सुख मान रहे हैं। कुंवारेपन का एक पहलू यह भी है। माता पिता अपनी बेटी के लिये ऐसा रिश्ता देख रहे हैं जो मुंबई,पूना, हैदराबाद,बैंगलुरु या विदेश में नौकरी कर रहा हो। बेटी का रिश्ता संयुक्त परिवार, कस्बों या छोटे नगरों में नहीं कर रहे हैं। जो अविवाहित युवक व्यापार कर रहे हैं। उनको रिश्ते नहीं मिल रहे हैं। कस्बों एवं छोटे नगरों में समाज इस सोच से युवकों में न चाहकर भी कुंवारापन तेजी से बढ़ रहा है।अंतरराष्ट्रीय सर्वे कहता है कि आने वाले कुछ वर्षों में युवतियों में 45% तक विवाह से दूरी बना सकती हैं! पहली नज़र में यह प्रगति लगती है, पर असल में यह भविष्य के लिए एक टाइम-बम है।कैरियर, पैसे और अकेलापन यह कैसी प्रगति? आज के बेटे- बेटी डॉक्टर, इंजीनियर, सी ए, उद्यमी, सब बन रहे है। बहुत अच्छा, शानदार पर क्या कैरियर पूरा जीवन है? पैसा साथी नहीं बनता। पद वृद्धावस्था में हाथ नहीं पकड़ता। मोबाइल और लैपटॉप बुढ़ापे में बात नहीं करते। लेकिन समाज को इस सच्चाई से फर्क नहीं पड़ता, सबको दौड़ लगानी है, बस लगानी है।
परिवार ढह रहे है कोई देख भी रहा है?कुँवारे लड़के बढ़ रहे हैं, अविवाहित युवतियाँ बढ़ रही हैं, जनसंख्या गिर रही है,और अकेलेपन उद्योग (counsellor, therapy, depression pills) फल-फूल रहा है। पर हम फिर भी कहते हैं, सब ठीक है, यह आधुनिकता है। यह आधुनिकता नहीं, धीमी मौत है, परिवार, समाज और मानवीय संबंधों की। सर्वाधिक खतरनाक स्थिति।आज माता-पिता रिश्ता ढूंढते हैं, पर लड़की कहती है, अभी नहीं। फिर अभी नहीं धीरे-धीरे कभी नहीं में बदल जाता है। और जब एहसास होता है तो मेडिकल रिपोर्ट सामने होती है, हार्मोनल इश्यू, कंसिव न होना, मानसिक तनाव, अकेलापन। पर तब कौन जिम्मेदार?कोई नहीं, क्योंकि फैसला स्वतंत्रता का था। समाज के सफेदपोश लोग चुप क्यों हैं।क्योंकि सच्चाई बोलने से उन्हेंआधुनिकता- विरोधी कहलाने का डर है। पर सच्चाई यह है कि अगर 21–25 की उपयुक्त उम्र में विवाह नहीं हुए तो समाज जल्द ही दिसंबर की ठंडी रात जैसा सूना हो जाएगा।अंतिम बात प्रगति वो नहीं जो हमें अकेला कर दे। अगर हमारा भविष्य कुंवारा, अकेला और भावहीन होने वाला है, तो समाज के लिए यह गर्व की नहीं,खतरे की घंटी है।
नोट-लेखक म.प्र.शासन से स्थायी अधिमान्य पत्रकार एवं भारतीय जैन मिलन के राष्ट्रीय संरक्षक हैं।
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प्रेषक:-विजय कुमार जैन वरिष्ठ पत्रकार राघौगढ़ जिला गुना म.प्र. पिन 473226
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