सूर्य और चंद्रमा पर जाना सरल है परन्तु स्वयं को जानना कठिन है: आचार्य श्री कनक नंदीजी गुरुदेव………………………..
अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट…. …………………….सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि सूर्य चंद्र पर जाना सरल है परंतु स्वयं को जानना कठिन है। जहां हम बैठे हैं वहीं पर हमने अनंत बार जन्म मरण किया है। चैतन्य चमत्कार भाव का चमत्कार है। शुभ भावों से पुण्य से सेवा से दान से साधु के आशीर्वाद से बड़े-बड़े रोग ठीक हो जाते हैं जिस पुण्य से मोक्ष मिलता है तो उससे सांसारिक सुख शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य क्यों नहीं प्राप्त होगा । स्वयं के पुण्य से साधु का आशीर्वाद भी प्राप्त हो जाता है। आत्मा की शक्ति, पुण्य की शक्ति, भावना की शक्ति अनंत है। भाव जब विशुद्ध हो जाता है तब आत्मा के 10 धर्म तथा आत्मा की अनंत शक्तियां प्रकट होती हैं।
चोर की तरह एनाकोंडा की तरह बगुला की तरह धर्म में व्यवहार करना स्वयं को धोखा देना है।
आत्मा के स्वभाव रूप परिणामन से साधु आशिक सिद्ध हो जाते हैं। जिस जिस अंश में साधु आत्म परिणमन करते हैं उस उस अंश में साधु सिद्ध है। बाह्य प्रपंच त्याग से आत्मशक्ति बढ़ती जाती है। भाव ही नरक ले जाता है भाव ही स्वर्ग ले जाता है। धर्म करते हुए भाव में पवित्रता नहीं तो अधिक पाप बंध होगा। पवित्र भाव के लिए ही सभी धर्म है।
समुद्र का पूरा पानी हम नहीं ले सकते परंतु उसमें से एक लोटा जल लेने से पूरे समुद्र में पाए जाने वाले लवण रसायन क्या है वह हमें ज्ञात हो जाता है वैसे ही हमारे पास जिनवाणी पूरी नहीं है कुछ अंश ही हमारे पास है परंतु उस थोड़ी जिनवाणी में भी वही आत्मज्ञान है जो हमारे तीर्थकरो ने दिव्यध्वनि में प्रसारित किया था।
निवाई से नीरज जैन तथा दिल्ली से डाँ निशाजी, सांगली से आनंदी वास्तवड़े कि जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री कनक नदी गुरुदेव ने बताया कि मनुष्य का भ्रूण शिशु अवस्था में हो लिक्विड अवस्था में हो या बालक अवस्था में हो वह मनुष्य ही होता है। परंतु हमें लिक्विड अवस्था में होने पर भी उसके आने का एहसास हो जाता है वैसे ही साधु आचार्य उपाध्याय अरिहंत सभी सिद्ध की प्रारंभिक अवस्थाएं हैं। जिस प्रकार सूर्य उदय होने से पहले लालिमा दिखाई देती है तो हमें ज्ञात हो जाता है कि सूर्य उदय होने वाला है वैसे ही साधु का स्वरूप है।
तीर्थंकर भगवान भी अपने परिवार के पापी लोगों का तथा अन्य भी पापी लोगों का उद्धार नहीं कर पाते हैं सबको उपदेश देते हैं परंतु जिसका पुण्य होता है वही गुरु उपदेश समझ पाता है सभी नहीं समझ पाते हैं परंतु तीर्थंकर भगवान तो सभी जीवो का उद्धार करना चाहते हैं दूसरे लोग नहीं समझे तो उनको हमें समझाना चाहिए परंतु संकलेश नहीं करना चाहिए माध्यस्थ भाव रखना चाहिए मंगल भावना भानी चाहिए की सभी का उद्धार हो।
लक्ष्य की और बढ़ने से कुछ कदम चलने से हम लक्ष्य को कुछ समय में प्राप्त कर सकते हैं वैसे ही राग द्वेष कषायों को मोह को जितने कितने अंश में हम त्याग करेंगे उतने उतने अंश में हमारे भाव शुद्ध होंगे और हम सिद्ध बनने के मार्ग पर चलेंगे. यह अंशाअंशी भाव है।
मुनिश्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता
मेरा भाव दर्पण सम होय, मेरा मन दर्पण सम होय। जैसा भाव वैसा प्रतिबिंब। द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी सागवाड़ा पुनर्वास कॉलोनी निवासी
विजयलक्ष्मी गोदावत ने दी।
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