सोशल मीडिया और जैनधर्म : चुनौती भी, उत्तरदायित्व भी
(डिजिटल माध्यम और जैनधर्म : सजगता ही प्रभावना का मार्ग)
-डॉ सुनील जैन संचय, ललितपुर
डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। आज विचार, छवियाँ और धारणाएँ कुछ ही क्षणों में विश्वव्यापी हो जाती हैं। यह सुविधा जितनी शक्तिशाली है, उतनी ही संवेदनशील भी। क्योंकि इसी माध्यम से सत्य का विस्तार होता है, तो वहीं असत्य और भ्रांति भी तीव्र गति से प्रसारित होती है। हाल के समय में सोशल मीडिया मंचों पर जैनधर्म से संबंधित भ्रामक वीडियो और रील्स का बढ़ता प्रसार इसी संवेदनशीलता का गंभीर उदाहरण है।
जैनधर्म, जो अहिंसा, आत्मसंयम और अनेकांत की उदात्त परंपरा का प्रतिनिधि है, आज डिजिटल संसार में अधूरी जानकारी, तकनीकी दुरुपयोग और पूर्वाग्रहपूर्ण प्रस्तुतियों का सामना कर रहा है। कुछ कंटेंट निर्माताओं द्वारा जैन सिद्धांतों, साधु जीवन और ऐतिहासिक परंपराओं को तथ्यविहीन एवं विकृत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता ( एआईं) जैसी आधुनिक तकनीकों के माध्यम से निर्मित दृश्य सामग्री दर्शकों में भ्रम उत्पन्न कर रही है, जिससे धर्म की सार्वजनिक छवि प्रभावित हो रही है।
यह भी विचारणीय है कि इस प्रकार की सामग्री का उद्देश्य प्रायः वैचारिक संवाद नहीं, बल्कि अधिकाधिक व्यूज, लाइक्स और आर्थिक लाभ अर्जित करना होता है। ऐसे में भावनात्मक प्रतिक्रिया या असंगठित विरोध अक्सर उल्टा प्रभाव डालता है और असत्य को ही अधिक प्रचार प्रदान करता है। इसलिए इस चुनौती का समाधान आवेश में नहीं, विवेक और रणनीति में निहित है।
जैन समाज को इस स्थिति का सामना रचनात्मक प्रत्युत्तर के माध्यम से करना होगा। तकनीकी रूप से दक्ष युवाओं का संगठित मंच, जो जैन दर्शन के विद्वानों के मार्गदर्शन में कार्य करे, समय की अनिवार्य आवश्यकता है। सोशल मीडिया की भाषा और संरचना को समझते हुए, उसी माध्यम पर जैनधर्म की प्रामाणिक, संतुलित और आकर्षक प्रस्तुति ही भ्रांतियों का स्थायी समाधान बन सकती है।
साथ ही, समाज में यह जागरूकता विकसित करना भी आवश्यक है कि भ्रामक सामग्री को देखने, साझा करने या उस पर प्रतिक्रिया देने से उसके प्रसार को ही बल मिलता है। इसके स्थान पर संगठित और तथ्यपरक रिपोर्टिंग, तथा आवश्यक होने पर विधिक उपायों का सहारा अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकता है। कानून के जानकारों की एक सक्रिय भूमिका इस दिशा में समाज को संरचनात्मक मजबूती प्रदान कर सकती है।
यह विषय केवल धार्मिक भावना का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का भी है। जैनधर्म की प्रभावना सदैव उसके संयमित आचरण, बौद्धिक स्पष्टता और नैतिक श्रेष्ठता से हुई है। आज भी यही मार्ग सर्वाधिक प्रासंगिक है। “कण्टकेनैव कण्टकम्” की उक्ति के अनुसार, असत्य का उत्तर आक्रोश से नहीं, बल्कि उससे अधिक सशक्त और सत्य प्रस्तुति से दिया जाना चाहिए।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल युग में निष्क्रियता भी एक प्रकार की सहमति बन जाती है। यदि समाज स्वयं अपनी परंपरा, सिद्धांत और मूल्यों को सम्यक् रूप में प्रस्तुत नहीं करेगा, तो अन्य लोग उन्हें अपने दृष्टिकोण से परिभाषित करेंगे। इसलिए समय की मांग है कि जैन समाज सजग, संगठित और दूरदर्शी दृष्टि के साथ इस चुनौती का सामना करे।
जैनधर्म केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी एक आवश्यक जीवन-दर्शन है। उसकी गरिमा, प्रभावना और विश्वसनीय प्रस्तुति की रक्षा आज के डिजिटल परिवेश में हम सभी का सामूहिक दायित्व है।












