अचलपुर (अमरावती)। परम पूज्य पट्टाचार्य,आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के मंगल शुभाशीष से श्री मज्जिनेन्द्र वर्द्धमान जिनबिम्ब पंचकल्याणक मानस्तंभ प्रतिष्ठा एवं विश्वशांति महायज्ञ महोत्सव परम पूज्य उपनयन संस्कार प्रणेता, प्राचीन जिनतीर्थ जीर्णोद्धारक, श्रमण श्री सुप्रभसागर जी महाराज संसंघ के सानिध्य में राजा ईल की ऐतिहासिक धर्मनगरी, श्री सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि की तलहटी में स्थित अचलपुर (अमरावती) महा. में 28 मार्च से 02 अप्रैल तक पंडित मुकेशशास्त्री विनम्र, गुरुग्राम एवं पंडित अखिलेश शास्त्री ‘ सुप्रज्ञ’ रमगढ़ा के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुआ।
जिसमें सौ. मीना-किरण गरीबे अमरावती को महाराजा सिद्धार्थ – महारानी त्रिशला, श्रीमती डिम्पल – संजय छाबड़ा छिंदवाड़ा को सौधर्म शची, सौ विशाखा – विकाश रायबागकर परतवाड़ा को धनपति कुबेर, सौ प्रियंका – राजेश हनुमंते अमरावती को महायज्ञनायक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। महामुनि वर्धमान जी को प्रथम पारणा करने का सौभाग्य रविन्द्र गहाणकर राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्कर्ष समूह (भारत) को महाराजा कूल बनकर प्राप्त हुआ।
नवीन मानस्तंभ का पुण्यर्जन श्रीमति राजकुमारी, ऋषभ – रिद्धिमा, आदित्य, आराध्या जैन, श्रेयांश टॉकीज परिवार छिंदवाड़ा को प्राप्त हुआ।
अचलापुर की दिशा ईशान, वहां मेढ़गिरि नाम प्रधान।
साढ़े तीन कोडि मुनिराय, तिनके चरण नमूँ तसु पाय।।
वही अचलपुर जिससे श्री सिद्धक्षेत्र मुक्तगिरि (मेंढ़गिरी) का नाम प्रसिद्धि को प्राप्त होता है, वहीं अचलपुर जहां (52) बावन मुहल्लों में राजा इल (इल) ने बावन जिनमंदिर बनवाए थे, जहां पर ऐसी सुरंग थी जो श्री सिद्धक्षेत्र मुक्तगिरि तक ले जाती थी। वर्तमान में सामाजिक उदासीनता, आपसी विकल्प समाज विरोधी संगठनों एवं देखरेख के अभाव में मात्र तीन ही मंदिर शेष रहे हैं, वे भी जीण- शीर्ण अवस्था को प्राप्त हो रहे है, पूर्वजों की वह धरोहर बाट जोह रही है अपने जीणोद्धार की।
अचलपुर में आज भी जहां – तहां जमीन की खुदाई में प्राचीन जिनप्रतिमा एवं जिन मंदिरो के अवशेष प्राप्त होते रहते है।
टक्कर चौक स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र अचलपुर का मंदिर भी उन तीन मंदिरों में से एक है। श्री सिद्धक्षेत्र मुक्तगिरि की वंदना के उपरांत विहार करते हुए परम पूज्य मुनि श्री सुप्रभ सागर जी के चरण इस क्षेत्र पर पड़े और निर्माण का कार्य परम पूज्य मुनिश्री के प्रेरणा से इस पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ ही प्रारंभ हो चुका है।
-डॉ सुनील जैन संचय
















