श्रावक दान और पूजा करने का कर्तव्य अवश्य निभाए: आचार्य श्री कनक नंदीजी
अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में फ्रांस से श्रैयासं की जिज्ञासा का समाधान करते हुए बताया कि श्रावक को भाग दौड़ की जिंदगी में भी अपना मुख्य कर्तव्य दान व पूजा अवश्य करना चाहिए। भाव पवित्र रखकर दान अवश्य देना चाहिए। गृहस्थ गृह कार्यो में पाप ही करते हैं। गृह कर्म से संचित पापों को धोने के लिए उत्कृष्ट अतिथि साधु को आहार दान देना चाहिए। प्रत्यक्ष पूजा केवल साधु की ही होती है। जीवंत परमेष्ठी आचार्य उपाध्याय साधु है। अरिहंत सिद्ध बनने के बाद उन्हें भोजन की सेवा की औषधि की कोई आवश्यकता नहीं होती। साधु अवस्था में ही आहार दान औषधी दान सेवा का अवसर श्रावको को प्राप्त होता है। मूर्ति को भूख नहीं लगती है उसको खिलाना पिलाना नहीं पड़ता। मंदिर में अभिषेक पूजा श्रावको को अवश्य करना चाहिए परंतु उससे भगवान को कुछ लाभ नहीं श्रावक को ही लाभ होता है। श्रावक का लोभ कम होता है। केवल श्रावक को ही संतुष्टि होती हैं। परंतु आहार दान से साधु व श्रावक दोनों को लाभ होता है। इससे साधु की तपस्या में वृद्धि होती है अच्छा स्वाध्याय कर पाते हैं स्वस्थ रहते हैं ध्यान कर पाते हैं, जिसे केवल ज्ञान होता है,उसके माध्यम से ही मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसलिए आहार दान को सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है। पूजा में पहले भाव पूजा है फिर द्रव्य पूजा है। पवित्र भाव सहित पूजा ही फलदाई है। उपवास बाह्य तप का पहला पहला चरण है। केवल उपवास करना ही संपूर्ण धर्म नहीं है।
दान धर्म अर्थात त्याग नहीं करते वह लोभ कषाय रुपी अग्नि में मरता है वह मिथ्या दृष्टि है। दान देता है वही सम्यक दृष्टि है। जो मुनि को दान नहीं देता वह मिथ्या दृष्टि है। सेवा दान जीवंत धर्म है। दान प्रकृति की संस्कृति है। प्रकृति भी अनाज सब्जियां खाना औषधि ऑक्सीजन पानी सभी दान करती है। आहार,भय, मैथुन, परिग्रह इन चार प्रकार के फोर्सो से यह जीव संसार में भ्रमण करता रहता है। गुरुत्वाकर्षण से भी अधिक इनका फोर्स है। इन चार फोर्सो के कारण पूरे ब्रह्मांड के जीव जन्म मरण करते रहते हैं। पाप से लिफ्ट संसारी जीवों के पाप धोने के लिए दान है। आधुनिक पीढ़ी अधिक उदार, सेवा भावी धर्म को समझने वाली है। ये जानकारी
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।
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