शाम 6 के बाद भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक !

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भारत और भारतीय लोगों को अपने देश की संस्कृति ,विज्ञान ,ज्ञान पर भरोसा नहीं होता जब तक वह पश्चिमी देशों से मान्यता प्राप्त नहीं करते हैं जैसे योग ,योगा बनकर आया तो हमने उसका स्वागत गर्मजोशी से किया .इसी प्रकार मांसाहार हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं को पश्चिमी देश हानिकारक बता रहे तब भी हम उनकी बात नहीं मान रहे हैं .भारत में रात्री भोजन निषेध होने के बावजूद यह आम प्रचलन में आ गया .इसके अलग अलग तर्क होते हैं ,किन्ही का कहना था की पूर्व में बिजली न होने के कारण रात्री भोजन निषेध था, कारण कीड़ा मकोड़ा उसमे गिर जाते थे पर आज बिजली का प्रकाश इतना तेज होता हैं की सूर्य के प्रकाश से अधिक होने के कारण रात्री भोजन करना कोई हानिकारक नहीं हैं .

कोई इसे अपनी प्रतिष्ठा मानते हैं तो कोई इसे अपनी शान मानते हैं परन्तु सूर्य अस्त के बाद जो सूक्ष्म जीवाणु उतपन्न होते हैं उनको कौन रोक सकता हैं ?इसके बाद रात्री भोजन के बाद हमारे आमाशय में ही भोजन रहता हैं उस कारण अजीर्ण और अपचन की शिकायत मिलती हैं ,जिससे रात्री में नींद आरामदायक नहीं होती .अनेक घातक बीमारियों होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता हैं इस बात की पुष्टि वैज्ञानिकों ने की हैं .इस सम्बन्ध में हमारे प्राचीन ग्रंथों में बहुत विस्तृत वर्णन किया गया हैं .

निशि भोजन का सादा अर्थ हैं रात -का- भोजन हैं जिसे हम रात्री भोजन भी कह सकते हैं .यह भोजन शरीर के लिए तो भारी होता हैं ,चित्त के लिए भी एक अतिरिक्त बोझ बनता हैं महाभारत के अनुसार उसके कारण तीर्थाटन और जप तप सब व्यर्थ हो जाते हैं .

मद्यमांसाशनम रात्रो भोजनम कंडभक्षणं .
ये कुर्वन्ति वृथा तेषां तीर्थयात्रा जपस्तपः.

आयुर्वेद में स्पष्ट कहा गया हैं की पहला भोजन सूर्योदय से तीन घंटे बाद ही किया जाना चाहिए और दूसरा भोजन –यदि आवश्यक हो तो सूर्यास्त से एक घंटे पूर्व .इन यामों के या काल में पाचनतंत्र अनुकूल होता हैं और आयुर्बल में वृद्धि करता हैं .दिन क्षय के अनुपात में वायु और पित्त बढ़ सकते हैं .चरक संहिता के अनुसार रात्री भोजन दूषित ,क्लिन्न और अमलीभूत होकर शरीर को भारी क्षति पहुंचाता हैं . गरुण पुराण में सूर्यास्त के बाद अन्न के मांस और जल के रक्त -जैसा हो जाने की बात बहुत स्पष्ट शब्दों में कही गयी हैं —

अस्तगंते दिवानाथे आपो रुधिरमुच्यते .
अन्नम मांससमम् प्रोक्तं मार्कण्डेय महर्षिना .
गीता के १७ वे अध्याय के दसवें श्लोक में ——
यात्यामं गतरसँ पूति पयूरषितं च यत .
उचिछष्टमपि चमेध्यं भोजनम तामसप्रियम .

बसी ,नीरस ,दुर्गन्धयुक्त ,उच्छिष्ट और अपवित्र आहार तामस मनुष्य को ही प्रिय होता हैं . रात का भोजन अन्य जीव जंतुओं के कारण उच्छिष्ट हो जाता हैं .गीता में रात्री भोजन को नरक का द्वार कहा गया हैं —

चत्वारि नरकद्वारम ,प्रथमं रात्रीभोजनम .
परस्त्रीगमनं चैव ,संधानांनत कायकम
ये रात्रौ सर्वहारम ,वर्ज्यन्ति सुमेधसः .
तेषां पक्षोपवासस्य ,फलं मासेन जायते.
नोदकं पातव्यं ,,राट्रावत्र युधिष्ठर .
तप्स्विनां विशेषण ,ग्रहिणाम ज्ञानसम्पदाम .

नरक के चार द्वार हैं — रात्रि भोजन ,परस्त्रीगमन ,संधान -भक्षण (अचार खाना ) तथा कंदमूल -भक्षण .जो प्रज्ञावंत पुरुष एक महीने तक निरंतर रात्रि भोजन का त्याग करते हैं ,उन्हें एक पक्ष का उपवास का फल प्राप्त होता हैं .इसलिए हे युधिष्ठर ग्यानी गृहस्थ को और विशेषतः तपस्वी को रात्री में पानी भी नहीं पीना चाहिए

इस प्रकार जैन आगम में रात्रि भोजन का त्याग का बहुत वर्णन हैं .रात्रि भोजन का निषेध अहिंसा महाव्रत में होता हैं आचार्य वट्टकेर ने इसे मुनियों के लिए छठवे अणुव्रत की संज्ञा दी हैं .छठवीं प्रतिमा में रात्रि भुक्तित्याग प्रतिमा का उल्लेख किया गया हैं . रात्रि भोजन न सिर्फ धर्म और आयुर्विज्ञान की दृष्टि से हानिकारक हैं ,बल्कि व्यक्तिगत जीवन दर्शन की कसौटी पर भी नुकसानदेह हैं वर्तमान में जो कोरोना वायरस का प्रकोप होने में अभक्ष्य भोजन के साथ अनियमित भोजन करना खासतौर पर रात्रि भोजन का एक महत्वपूर्ण कारण हैं .आपने देखा होगा की अधिकांश भोजन विषाक्तता का कारण रात्रि भोजन ही होता हैं ,रात्रि में भोजन निर्माण करते समय छोटे मोटे कीड़ों के साथ कभी कभी कढ़ाइयों में छिपकली .चूहा ,सांप आदि का गिरना आम बात होती हैं और कीड़े मकोड़े मसालों में समाहित हो जाते हैं .

इसलिए पश्चिमी सभ्यता को ही सर्वोपरि मानकर कम से कम रात्रि भोजन त्याग करो .जैन धर्माबलंबियों में सूर्यास्त के एक घंटे पहले शाम का भोजन करने की पद्धति /चलन हैं जो सदियों से चली आ रही हैं .जो सर्वमान्य थी ,हैं और रहेंगी .उसे किसी वैज्ञानिक की सालाह की जरुरत नहीं हैं .हां हम उम्मीद करते हैं की धार्मिक और वैज्ञानिक आधार पर रात्रि भोजन का त्याग करना श्रेयस होगा .

भारत गारत बनता जा रहा हैं पहले शिक्षा में ,चिकित्सा में सेंध लगाई उसके बाद भोजन ,और नैतिकता पर किया आक्रमण हमको बनाया मानसिक ,शारीरिक गुलाम बनाया इसके बाद सैकंडों वर्षो हमको लूटा और बनाया गुलाम और ऐसा व्यसनी बनाया की हम बनते गए पराधीन और गुलाम इस कारण हम तन धन मन और धर्म से दूर हो गए कोरोना जैसे अनेकों अनेक रोगों से ग्रसित होकर अनचाहे मौत के मुंह में समायेंगे मांसाहार ,मछली अंडा मांस शराब को त्यागो नहीं तो मजबूरी में त्यागना पड़ेगा नहीं तो बुलाओ मौत को अपने द्वारे

-विद्यावास्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन ,संरक्षक शाकाहार परिषद्

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