सुमति नाथ जिनालय में विराजमान अंतर्मना आचार्य 108 श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के सानिध्य में इन दिनों भक्ति और ज्ञान की त्रिवेणी बह रही है। प्रतिदिन तड़के 4:30 बजे आयोजित होने वाली ‘दीप पूजा’ में जन सैलाब उमड़ रहा है, वहीं गुरुदेव के मंगल प्रवचन भक्तों को आत्म-कल्याण का मार्ग दिखा रहे हैं। समाज के प्रवक्ता महेंद्र कवालिया ने बताया कि शुक्रवार को प्रातःकालीन सभा में आचार्य श्री ने ‘सत्य’ की महत्ता को प्रतिपादित किया। आचार्य श्री ने उद्बोधन में कहा कि सत्य केवल विमर्श का विषय नहीं, अपितु मोक्ष का सोपान (सीढ़ी)
है। वाणी के महत्व की समझाते हुए उन्हेंनि इसके तीन भेद स्पष्ट किएः निजवाणीः जो स्वयं के व्यक्तिगत विचार हैं। जनवाणीः जो लोक-मत या बहुमत की धारणा है।
जिनवाणीः जो तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित शास्त्रों में अंकित है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि शास्त्रों में निहित सत्य को बिना तर्क और पूर्ण श्रद्धा के साथ स्वीकार करना ही वास्तविक धर्म है। वाणी में तनिक भी असावधानी मनुष्य को भारी क्षति पहुँचा सकती है, अतः बोलने से पूर्व चिंतन अनिवार्य है।
मानवता और सुखी जीवन के सूत्र
गुरुदेव ने मानवता और प्रेम का मर्मस्पर्शी संदेश देते हुए कहा कि प्यार परिचय को पहचान बना देता है, वीराने को गुलिस्तान बना देता है; पराया नहीं, अपनों का दर्द ही आदमी को इंसान बना देता है। आज के भौतिकतावादी युग पर कटाक्ष
करते हुए उन्होंने जीवन को सुखी बनाने का मंत्र दियाः
संसारः यहाँ केवल सुख की चाह है, पर वास्तविक शांति भीतर है।
जीनाः वर्तमान में जीवन केवल ‘भोग’ में व्यतीत हो रहा है।
शरीरः संयम के अभाव में शरीर रोगों का घर बनता जा रहा है।
संबंधः अंततः वियोग निश्चित है, अतः मोह का त्याग करें।
संत समागमः यही आत्म-उपयोग और शाश्वत कल्याण का एकमात्र मार्ग है।
आचार्य श्री ने भक्तों का आह्वान किया कि यदि मनुष्य इन सूत्रों को अपने आचरण में उतार ले, तो वह जीवन की कठिनतम परिस्थितियों को भी सुगमता से पार कर सकता है। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद














