सरलता और सदाचार जीवन का मूलआधार है – मुनिश्री विलोकसागर

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पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन – संयम की साधना जारी

मुरैना (मनोज जैन नायक) पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए जैन संत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि माया कषाय जीव के लिए बहुत खतरनाक है । माया कषाय करने से जीव को नरक तिरंच आदि गतियां में कई भवो तक चक्कर लगाने पड़ते हैं ।आज तक जितने भी जीव इस संसार से पार हुए हैं उन सभी जीवो को छल कपट को छोड़कर के उत्तम आर्जव धर्म को अपनाना पड़ा है । मन, वाणी और शरीर से कुटिलता या छल न करना ही आर्जव है। जो प्राणी न तो कपटपूर्ण विचार रखता है, न कपटपूर्ण कार्य करता है, न कपटपूर्ण बातें बोलता है, न अपने दोषों को छिपाता है, वह आर्जव गुण से युक्त होता है। आर्जव का अर्थ है सीधापन, ईमानदारी, और निष्कपटता। इसका मतलब है विचारों, वाणी और कर्मों में सरलता और सच्चाई, जिसमें कोई दिखावा या कुटिलता नहीं होती है।
सभी जैन मंदिरों में हो रहे हैं धार्मिक अनुष्ठान
नगर के अन्य सभी जिनालयों में भी उत्तम आर्जव धर्म पर व्याख्यान, चर्चा एवं पूजन किया गया । पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन बहुतायत संख्या में श्रावकों ने पीले वस्त्र धारणकर पूजा अर्चना की । इस अवसर पर नसियां जी जैन मंदिर में प्रवीणकुमार, नवीनकुमार, दीपक जैन चैटा परिवार को प्रथम कलशाभिषेक करने एवं प्रथम शांतिधारा नवीनकुमार पारस जैन पुनविया परिवार एवं द्वितीय शांतिधारा रामेश्वर दयाल मनोजकुमार पुष्पेंद्र जैन नायक परिवार को प्राप्त हुआ ।
शाम को आरती के पश्चात सुरेंद्रकुमार जैन ने शास्त्र गद्दी पर बैठकर आगमानुसार आर्जव धर्म की व्याख्या की । शास्त्र सभा में अनेकों श्रावक एवं श्राविकाएं उपस्थित थे ।

दसलक्षण विधान में नीरज शास्त्री ने बताया आर्जव धर्म
दसलक्षण महापर्व के तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म की दिन श्री दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में प्रातः अभिषेक, शांति धारा, पूजन एवं दसलक्षण विधान आदि बड़ी धूमधाम से संपन्न कराया गया । सर्वप्रथम श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक स्वर्ण कलश के माध्यम से करने का सौभाग्य महावीरप्रसाद विमल जैन बघपुरा परिवार को एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य डालचंद निखिल कुमार जैन बरहाना एवं द्वितीय शांतिधारा का सौभाग्य दीप कुमार जैन को प्राप्त हुआ । उसके उपरांत सांगानेर से पधारे हुए पंडित नीरज कुमार जैन शास्त्री के निर्देशन में पूजन एवं विधान संपन्न कराया गया । संगीतकार के रूप में श्री मुकेश जी सुसनेर ने अपनी स्वर लहरियां बिखेरी । दोपहर में श्री तत्त्व अर्थ सूत्र का वाचन महिला मंडल के द्वारा किया गया एवं युगल मुनिराजों के द्वारा तत्वार्थ सूत्र का अर्थ समझाया गया सायंकालीन समय में प्रतिक्रमण शंका समाधान और उसके उपरांत आरती के बाद पंडित नीरज जैन शास्त्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा की छल कपट जीव को इस संसार में घूमाता है हमारे मन वचन काय की क्रिया को हमेशा एक होनी चाहिए जिस प्रकार साप बाहर तो टेढ़ा मेंड़ा होकर के घूमता रहता है लेकिन जब वह अपने बिल में जाता है तो उसको सीधा होना ही पड़ता है उसी प्रकार यह जीव संसार में तो भले ही वक्र परिणाम के साथ में घूमता रहे लेकिन जब उसे मोक्ष की यात्रा करनी होती है तो उसको अपने परिणामों को सीधा करना पड़ता है उसको आर्जव धर्म को अपनाना ही पड़ता है ।

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