संस्कार हीनता ने हमारी वास्तविक पहचान को जकड़ लिया है और हमें अमर्यादित बना दिया है

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संस्कारहीनता : एक चिंतन

संस्कार हीनता ने हमारी वास्तविक पहचान को जकड़ लिया है और हमें अमर्यादित बना दिया है

फागी संवाददाता
23 मार्च

संस्कार हीनता एक चिंतन का विषय है यह एक ऐसा विषय है, जिस पर गंभीर चिंतन करना आज अत्यंत आवश्यक हो गया है, वर्तमान समय में इसका संकट इतना बढ़ गया है कि हमारे चारों ओर का वातावरण आत्मीयता और रिश्तों की सच्चाई से दूर होकर मात्र आडम्बर बनकर रह गया है, उक्त विषय पर प्रसिद्ध समाज सेविका दुर्गापुरा महिला मंडल की संरक्षक श्रीमती चंदा सेठी ने बताया की आज स्थिति ऐसी है कि बड़े-बड़े उपदेशकों के उपदेशों तथा धर्मग्रंथों का भी लोगों पर कोई विशेष प्रभाव दिखाई नहीं देता,पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव
संस्कारहीनता से ग्रस्त हमारे तन-मन पर पाश्चात्य जीवन-शैली, चाल-चलन और तौर-तरीकों का रंग लगातार गहराता जा रहा है, पाश्चात्य संस्कृति ने विभिन्न रूपों में हमें प्रभावित किया है और हमारी सांस्कृतिक परंपराओं तथा श्रद्धा को कमजोर कर दिया है,हमारे रीति-रिवाज, खान-पान, बोलचाल—सबका पश्चिमीकरण तेजी से हो रहा है।सही ही कहा गया है
यह हवा कैसी चलने लगी,
रंग मिट्टी बदलने लगी।
आदमी पर्वतों पर चढ़ा,
आदमीयत फिसलने लगी।
संस्कार विहीनता का दुष्प्रभाव
आज माँ-बेटी, पिता-पुत्र सभी अपनी मर्यादाओं और आस्थाओं से दूर होते जा रहे हैं, संस्कारों की गरिमा हमारे जीवन से लुप्त होती दिखाई दे रही है, जिसके कारण मानवता चारों ओर सिसक रही है, संस्कारहीनता ने हमारी वास्तविक पहचान को जकड़ लिया है और हमें अमर्यादित बना दिया है।
संस्कारों के अभाव में ही राक्षसी प्रवृत्तियाँ पनपती हैं। मन में स्वार्थ, लोभ, मोह, ईर्ष्या और अहंकार जैसे दोष बने रहते हैं, जिससे हमारा मन (जो एक ‘मंगल गृह’ होना चाहिए) शुद्ध और शांत नहीं बन पाता।
संस्कारों का महत्व
संस्कार ही मन को सुव्यवस्थित और संतुलित बनाते हैं। वर्तमान परिवेश में माता-पिता स्वयं संस्कारी बनकर ही अपने बच्चों को संस्कारों की ओर प्रेरित कर सकते हैं। आज हमारा रहन-सहन, वेश-भूषा, खान-पान, बोलचाल और शिक्षा—सब कहीं न कहीं संस्कारहीनता की ओर झुकते जा रहे हैं। विशेष रूप से वेशभूषा में आई विकृति चिंताजनक है।
आधुनिकता और संस्कारों का संकट
आज के युग में टीवी और वातानुकूलित कमरों की सुविधा के बीच संस्कारों की चमक फीकी पड़ती जा रही है। विज्ञान नए-नए आविष्कार कर सकता है, परंतु संस्कारों का निर्माण नहीं कर सकता,आधुनिकता के अंधानुकरण ने हमारी प्राचीन संस्कृति को कमजोर कर दिया है।
मनुष्य, जो कभी रक्षक था, आज भक्षक बनने की ओर अग्रसर है। त्याग, समर्पण और एक-दूसरे के लिए बलिदान की भावना दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने ज्ञान तो दिया है, परंतु नैतिकता और आत्मिक विकास की उपेक्षा की है।
सादगी के वस्त्र सत्कार कराते हैं, और वासना के वस्त्र बलात्कार कराते हैं। आज हमारी परंपराएँ और आध्यात्मिकता हमें पिछड़ेपन का प्रतीक लगने लगी हैं। यही हमारी सबसे बड़ी भूल है,निष्कर्ष अंततः सार यही है कि देश स्वतंत्र होने के बावजूद आज भी हम वैचारिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाए हैं। सांस्कृतिक, सामाजिक, व्यवहारिक और मानसिक गुलामी आज भी हमारे भीतर विद्यमान है।आवश्यकता है कि हम अपने संस्कारों को पहचानें, उन्हें अपनाएँ और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।

राजाबाबू गोधा जैन महासभा मिडिया प्रवक्ता राजस्थान

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