ऋजुता अर्थात सरलता धारण करना ही आर्जव धर्म है संजय जैन बड़जात्या

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दस लक्षण पर्व के क्रम को दृष्टिगत करे तो चार कषायों अर्थात क्रोध,मान,माया और लोभ का शमन प्रारम्भिक चार धर्म क्रमश क्षमा,मार्दव,आर्जव और शौच के माध्यम से होता है। जब हम क्रोध का त्याग कर क्षमा को धारण कर लेते हैं तो स्वतः ही मार्दव अर्थात मान का मर्दन हो जाता है। जब व्यक्ति का मान गलित हो जाता है तो फिर तीसरा धर्म आर्जव जिसे सरल भाषा मे समझे तो ऋजुता का समावेश जीवन मे हो जाता है।
दसलक्षण धर्म के तीसरे दिवस उत्तम आर्जव धर्म का बीजारोपण होता है। क्योंकि जब तक हृदय में ऋजुता नहीं होगी तब तक कोई बीज अंकुरित नहीं होगा और अकड़न तो वैसे भी मुर्दा की पहचान है। जीवन को सरल रेखा की तरह ही व्यतीत करना उत्कृष्ट व सज्जन व्यक्तित्व की निशानी है।
उत्तम आर्जव धर्म व्यक्ति को बनावटी दुनिया से बाहर निकालता है। आज प्रत्येक व्यक्ति मोबाइल से लेस है, क्योंकि आज मोबाइल की दुनिया है। आप ही बताओ क्या जैसे आप इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सएप या अन्य सोशल मीडिया पर दिखते हो असल जिंदगी में भी वैसे ही हो क्या? “नहीं आप” जैसे हो वैसे दिखते नहीं,जैसे आप दिखते हो वैसे नही हो। आर्जव धर्म तो कहता है जो है वह रहें, जो नहीं है वैसे बनने का प्रयास करना तो छल व मायाचारी है। मायाचार ही मोक्ष मार्ग का सबसे बड़ा अवरोधक है।
व्यक्ति के शरीर का सबसे खूबसूरत हिस्सा उसका दिल (हृदय) है मगर वही साफ ना हो तो मात्र चमकता चेहरा किसी काम का नहीं। इसलिए आप अपने कठोर मनोभावों को बदले, वस्त्राभूषण नहीं। क्योंकि आईना बदलने से शक्ल नहीं बदलती, सरलता,सहजता कोमलता,संवेदनशीलता व स्पष्टवादी होना आर्जव धर्म की निशानी है।
वैसे वर्तमान की इस बनावटी दुनिया मे सबसे कठिन कार्य यदि कोई है तो वह स्वयं को सरल बनाना ही है।आप सोच रहे हैं क्या वही बोल रहे हैं? जो बोल रहे हैं क्या वही कर रहे हैं? यदि यदि नहीं तो अपनी प्रवृत्ति बदले। निश्चल प्रवृत्ति धारण करें यही आर्जव धर्म सिखाता है।
संजय जैन बड़जात्या कामां, राष्ट्रीय प्रचार मंत्री धर्म जागृति संस्थान

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