(केंद्रीय विश्वविद्यालय दिल्ली में ऋषभदेव जन्मकल्याणक पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन )
प्रायः ऋषभदेव को लोग एक राजा और महापुरुष के रूप में नाम लेते हैं किंतु वे सिर्फ एक महापुरुष नहीं थे, स्वयं वीतरागी भगवान् थे – यह अभिप्राय तीर्थंकर ऋषभदेव पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोलते हुए व्याकरणशास्त्र विभाग के वरिष्ठ आचार्य एवं श्रीमद्भागवत के व्याख्याकार आचार्य जयकांतसिंह शर्मा ने अपने व्याख्यान में व्यक्त किया ।
ज्ञातव्य है कि दिनांक 24/03/2025 को
नई दिल्ली, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के जैनदर्शन विभाग द्वारा तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्मकल्याणक के अवसर पर ऋषभदेव राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया । दर्शनपीठ के अध्यक्ष प्रो. आरावमुदनजी के सान्निध्य में इस कार्यक्रम की अध्यक्षता जैनदर्शन के विभागाध्यक्ष प्रो. वीरसागर जैन ने तथा संचालन प्रोफेसर अनेकांत कुमार जैन ने किया। शुभारंभ मंगलाचरण – भक्तामर स्तोत्र के छन्दों से जैन दर्शन की छात्राओं श्रुति एवं स्तुति द्वारा किया गया। तत्पश्चात प्रोफेसर अनेकांतजी ने तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के वीतरागी चरित्र एवं व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए सभी का स्वागत व अभिनंदन किया ।
इसके उपरान्त मुख्यवक्ता व्याकरणशास्त्र के आचार्य प्रो. जयकांतसिंह शर्मा जी ने अपने वक्तव्य के माध्यम से बताया कि श्रीमद् भागवत महापुराण अपने संकल्प के आधार पर पंचम स्कंध में भगवान् ऋषभदेव का वर्णन करते हैं और उसके अनुसार इस सृष्टि के पालक सर्जक एवं संहारक जो परमात्मा हैं वही ऋषभदेव के रूप में प्रकट हुए हैं । भागवत् पुराण की दृष्टि से ऋषभदेव आचार्य व कोई महापुरुष नहीं हैं, वह स्वयं साक्षात् वीतरागी भगवान् हैं । उन्होंने बताया कि भगवान ऋषभदेव के पिता का नाम नाभि था जिनके नाम पर ही भारतवर्ष का नाम पहले अजनाभवर्ष था तथा उनके अनन्तर उनके पुत्र सम्राट चक्रवर्ती भरत के नाम पर ही आज भारतवर्ष नाम पड़ा । ऋषभदेव भगवान के चरित्र ने भगवान् लक्षण को अभिव्यक्त किया है – अयमवतारो रजसोपप्लुतकैवल्योपशिक्षणार्थः। (१२भागवत पुराण)
अर्थात् भगवान का यह अवतार रजोगुण से भरे हुए लोगों को मोक्षमार्ग की शिक्षा देने के लिये ही हुआ था । उन्होंने कहा कि अन्य अवतार भी हैं किंतु ऋषभदेव का महत्त्व इस बात पर उन सभी से भिन्न है कि इन्होंने लोगों को संसारचक्र से मुक्त होने के लिए मोक्षमार्ग का शिक्षण किया ।
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए केंद्रीय विश्वविद्यालय,त्रिपुरा के आचार्य डॉ.सुमन के.एस. ने अपना उद्बोधन देते हुए तीर्थंकर ऋषभदेव का वर्णन करते हुए कहा कि जहां ऋषभदेव ने गमन किया वो क्षेत्र ही तीर्थक्षेत्र बन गए हैं ।
और इसी श्रृंखला में प्रो. आरावमुदन जी ने अपने उद्बोधन में भगवान ऋषभदेव के आध्यात्मिक व्यक्तित्व की सूक्ष्म चर्चा की।
प्रो. वीरसागर जैन ने अध्यक्षीय वक्तव्य में भगवान ऋषभदेव को प्रणाम करते हुए कहा कि जो सभी मुनियों के द्वारा व नरामरेन्द्रों के द्वारा स्मरण किए जाते हैं, जिनका वेद पुराण इत्यादि सब गुणगान करते हैं ऐसे ही ऋषभदेव को मैं अपने हृदय में विराजमान करता हूं । उन्होंने कहा कि ऋषभदेव को परम वीतरागी कहा जाता है, जो निष्काम भाव से रहता है वही शहंशाह होता है। वैदिक संस्कृति श्रमण संस्कृति के बीच जो कुछ सामान्य अंतर है यदि उन अंतरों को गौण कर दिया जाए तो जैन पुराणों में वर्णित ऋषभदेव और भागवत में वर्णित ऋषभदेव में कोई विशेष अंतर नज़र नहीं आता है।
प्रो अनेकान्त कुमार जैन ने बताया कि वैदिक और श्रमण सभी मानते हैं कि ऋषभदेव के १०० पुत्र थे किंतु जैन ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि उनकी ब्राम्ही और सुन्दरी नामक दो पुत्रियां भी थीं, जिनको ऋषभदेव ने सर्वप्रथम युग के आरम्भ में ब्राम्ही को लिपिविद्या और सुन्दरी को अंकविद्या का ज्ञान दिया। इस देश में जो यह कहते हैं कि महिलाओं को पहले शिक्षित नहीं किया जाता था, उनको हम यह बताना चाहते हैं कि आदिनाथ ऋषभदेव ऐसे महानायक थे जिन्होंने अपनी दोनों पुत्रियों को सर्वप्रथम शिक्षा देकर सबसे पहले स्त्रीशिक्षा की वकालत की थी।
साहित्य संस्कृति संकाय एवं
प्राकृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो जयकुमार उपाध्ये ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
इस संगोष्ठी में विभिन्न शास्त्रों के अनेक आचार्य एवं शोधछात्र उपस्थित हुए ।
जेबा आफरीन (शोधछात्रा)