राष्ट्रपति भवन में ‘ग्रंथ कुटीर’ और भारत की ज्ञान-परंपरा: प्राकृत भाषा की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा -डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर

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राष्ट्रपति भवन में ‘ग्रंथ कुटीर’ और भारत की ज्ञान-परंपरा:  प्राकृत भाषा की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा
-डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर
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राष्ट्रपति भवन परिसर में 23 जनवरी 2026 को ‘ग्रंथ कुटीर’ का उद्घाटन भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु द्वारा किया जाना भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी अर्थ रखने वाला क्षण है। यह पहल केवल एक संग्रहालय या पुस्तकालय की स्थापना नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक विरासत के पुनर्स्मरण का सशक्त प्रतीक है।
ग्रंथ कुटीर में भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं—तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, ओडिया, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला—में उपलब्ध पांडुलिपियों और पुस्तकों का समृद्ध संग्रह संजोया गया है। इस कुटीर में लगभग 2,300 पुस्तकों के साथ-साथ लगभग 50 दुर्लभ पांडुलिपियाँ भी संरक्षित हैं। इनमें से अनेक पांडुलिपियाँ ताड़पत्र, पारंपरिक हस्तनिर्मित कागज, छाल और वस्त्र जैसे प्राचीन माध्यमों पर हस्तलिखित हैं, जो भारतीय ज्ञान परंपरा की अनुशासित लेखन संस्कृति और संरक्षण-दृष्टि को सजीव रूप में प्रस्तुत करती हैं।
ग्रंथ कुटीर का यह संग्रह महाकाव्य, दर्शन, भाषा-विज्ञान, इतिहास, शासन, विज्ञान और भक्ति साहित्य जैसे विविध विषयों को समाहित करता है। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इन शास्त्रीय भाषाओं में भारत के संविधान की प्रतियाँ भी इस संग्रह का हिस्सा हैं, जो प्राचीन ज्ञान और आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना के बीच सेतु का कार्य करती हैं।
गौरतलब है कि भारत सरकार द्वारा 3 अक्टूबर 2024 को मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया गया था। इससे पूर्व छह भाषाएँ ही इस श्रेणी में सम्मिलित थीं। ‘ग्रंथ कुटीर’ में इन नव-मान्य शास्त्रीय भाषाओं को सम्मानजनक स्थान मिलना भारत की सांस्कृतिक नीति में आए एक सकारात्मक और संतुलित परिवर्तन को रेखांकित करता है।
उद्घाटन अवसर पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि ग्रंथ कुटीर भारत की शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण और प्रचार के लिए राष्ट्रपति भवन के सामूहिक प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में इस कुटीर का संग्रह निरंतर समृद्ध होता जाएगा और यह स्थान विशेष रूप से युवाओं को भारत की शास्त्रीय भाषाओं को जानने, समझने और उनसे जुड़ने के लिए प्रेरित करेगा।
वस्तुतः, 23 जनवरी 2026 को ग्रंथ कुटीर का उद्घाटन केवल एक औपचारिक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारत की बौद्धिक और आध्यात्मिक आत्मा की ओर लौटने का प्रतीकात्मक संकेत है। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधानिक संस्थान में जैन दर्शन, प्राकृत भाषा और श्रमण परंपरा से जुड़े ग्रंथों को स्थान मिलना इस तथ्य को उजागर करता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा की मुख्यधारा अब अपने मूल स्रोतों को पुनः पहचानने लगी है।
औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय दर्शन को प्रायः संस्कृत-केंद्रित या आधुनिक दृष्टिकोणों तक सीमित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप श्रमण परंपरा, लोकभाषाएँ और नैतिक दर्शन हाशिए पर चले गए। ग्रंथ कुटीर की स्थापना इस ऐतिहासिक असंतुलन को सुधारने की दिशा में एक सार्थक और विचारोत्तेजक हस्तक्षेप है। यह स्पष्ट करती है कि भारतीय दर्शन की जड़ें केवल सत्ता-संरचनाओं में नहीं, बल्कि तप, त्याग, अहिंसा और आत्मानुशासन पर आधारित साधना-परंपराओं में निहित हैं।
प्राकृत भाषा को शास्त्रीय दर्जा दिए जाने के पश्चात राष्ट्रपति भवन के पुस्तकालय में प्राकृत जैन ग्रंथों को गरिमामय स्थान मिलना सांस्कृतिक नीति के स्तर पर एक स्पष्ट संदेश देता है। यह स्वीकारोक्ति है कि प्राकृत भाषा केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की जीवंत संवाहक रही है, जिसने आत्मा, कर्म और मोक्ष जैसे गूढ़ दार्शनिक विषयों को लोकबोधगम्य भाषा में अभिव्यक्त किया।
ग्रंथ कुटीर में आचार्य कुंदकुंद देव द्वारा रचित समयसार और प्रवचनसार को स्थान दिया जाना विशेष महत्व रखता है। ये ग्रंथ जैन दर्शन को एक स्वतंत्र, तर्कप्रधान और वैज्ञानिक दार्शनिक प्रणाली के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। आत्मा के शुद्ध स्वरूप तथा निश्चय-व्यवहार नय की सूक्ष्म व्याख्या आज के भौतिकतावादी और उपभोक्तावादी समाज के लिए भी गहन आत्ममंथन का अवसर प्रदान करती है। इसी प्रकार गोम्मटसार जैसे ग्रंथ जैन कर्म सिद्धांत को केवल आस्था नहीं, बल्कि नैतिक और गणनात्मक विवेक पर आधारित सुव्यवस्थित चिंतन-पद्धति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
कुल मिलाकर, ग्रंथ कुटीर की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह औपनिवेशिक बौद्धिक विरासत से आगे बढ़कर भारतीय ज्ञान परंपरा को उसके स्वदेशी संदर्भ में पुनः स्थापित करता है। राष्ट्रपति भवन जैसे राष्ट्रीय प्रतीक स्थल में जैन दर्शन और प्राकृत साहित्य की उपस्थिति यह संकेत देती है कि भारतीय संस्कृति की आत्मा सत्ता से नहीं, साधना से निर्मित हुई है।
आवश्यक है कि यह पहल प्रतीकात्मक स्तर तक सीमित न रह जाए। इसे अकादमिक अनुसंधान, शिक्षा नीति और सार्वजनिक सांस्कृतिक संवाद से जोड़ा जाए, ताकि भारतीय ज्ञान परंपरा जीवंत विमर्श का अंग बन सके। यदि ‘ग्रंथ कुटीर’ विचार-केंद्र के रूप में विकसित होता है, तो यह न केवल अतीत के संरक्षण का माध्यम बनेगा, बल्कि भविष्य की वैचारिक दिशा भी निर्धारित करेगा।

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