पुस्तक समीक्षा : आस्था का मानचित्र, तकनीक का सेतु : ‘दिगंबर जैन तीर्थ निर्देशिका’

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धार्मिक साहित्य केवल आस्था का दस्तावेज़ नहीं होता, वह समाज की स्मृति, परंपरा और मार्गदर्शन का जीवंत माध्यम भी होता है। जैन समाज की ऐसी ही एक अनुपम कृति ‘दिगंबर जैन तीर्थ निर्देशिका’ ने न केवल अपनी उपयोगिता सिद्ध की है, बल्कि अपने अद्वितीय स्वरूप और व्यापक प्रभाव के कारण विश्व स्तर पर भी प्रतिष्ठा अर्जित की है। Golden Book of World Records में इसका सम्मिलित होना इस कृति की प्रासंगिकता और महत्ता का प्रमाण है।
यह निर्देशिका केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि तीर्थयात्रा के समग्र अनुभव को सरल, सुगम और सुव्यवस्थित बनाने वाला एक सशक्त माध्यम है। 267 जैन तीर्थों का सुविचारित संकलन, उनके ऐतिहासिक, भौगोलिक और व्यवस्थागत विवरणों के साथ प्रस्तुत किया गया है। इस दृष्टि से यह कृति जैन समाज की जीवंत धरोहर के रूप में स्थापित होती है, जो श्रद्धा और व्यवहारिकता—दोनों का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती है।
इस निर्देशिका की सबसे बड़ी विशेषता इसका समयानुकूल अद्यतन स्वरूप है। 12वें संस्करण में सम्मिलित लोकेशन क्यूआर कोड इसकी आधुनिकता का परिचायक है, जिसके माध्यम से तीर्थयात्री सीधे अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं। यह सुविधा केवल तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि तीर्थयात्रा की परंपरा को डिजिटल युग से जोड़ने का सार्थक प्रयास है। साथ ही, प्रत्येक तीर्थ से संबंधित मोबाइल नंबर, ईमेल, वेबसाइट, आवास व्यवस्था, भोजनशाला, यातायात दूरी, स्थल की भौगोलिक संरचना (पहाड़, सीढ़ियाँ, वाहन सुविधा) और आसपास के अन्य तीर्थों की जानकारी—इन सबका समावेश इसे एक सम्पूर्ण मार्गदर्शिका बनाता है।
इस कृति के संपादक समाज श्रेष्ठी भाईसाब हसमुख जैन जी  गांधी इंदौर का अथक श्रम और समर्पण इस निर्देशिका के प्रत्येक पृष्ठ पर दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने न केवल सूचनाओं का संकलन किया, बल्कि उसे एक व्यवस्थित, उपयोगी और सहज रूप में प्रस्तुत कर जैन समाज को एक अमूल्य धरोहर प्रदान की है। प्रधान संपादक डॉ अनुपम जी जैन के नेतृत्व में यह कार्य और अधिक सुसंगठित एवं प्रामाणिक बन पाया है।
इस निर्देशिका की उपयोगिता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इसके माध्यम से प्रतिवर्ष 10 लाख से अधिक यात्री तीर्थयात्रा करते हैं। 2004 से प्रारंभ हुआ यह यात्रा-वृत्तांत 21 वर्षों में 1,00,000 प्रतियों तक पहुँचकर एक ऐतिहासिक मुकाम हासिल करता है। यह केवल संख्या नहीं, बल्कि समाज के विश्वास और स्वीकार्यता का प्रमाण है।
निर्देशिका की संरचना भी अत्यंत सुविचारित है—राज्यवार अनुक्रम, अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सूची, प्रदेशवार नक्शे, और यहाँ तक कि विदेशों (विशेषकर अमेरिका) में स्थित जैन मंदिरों का समावेश—ये सभी इसे वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। इस प्रकार यह कृति केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि विश्वव्यापी जैन समुदाय को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करती है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि का औपचारिक प्रमाणन डॉ मनीष विश्नोई द्वारा प्रदान किया जाना इस कृति की अंतरराष्ट्रीय मान्यता को और भी सुदृढ़ करता है। रवीन्द्र नाट्यगृह में आयोजित भव्य विमोचन समारोह इस उपलब्धि का साक्षी बना, जहाँ समाज के विभिन्न वर्गों की गरिमामयी उपस्थिति ने इस कृति के सामाजिक महत्व को रेखांकित किया।
समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाए तो ‘दिगंबर जैन तीर्थ निर्देशिका’ केवल एक संदर्भ ग्रंथ नहीं, बल्कि तीर्थ संरक्षण और संवर्धन की प्रेरक शक्ति भी है। तीर्थों का संरक्षण तभी संभव है जब वहाँ सतत आवागमन बना रहे, और यह निर्देशिका उसी दिशा में एक सशक्त सेतु का कार्य करती है। यह श्रद्धालुओं को न केवल मार्ग दिखाती है, बल्कि उन्हें तीर्थों से जोड़कर सांस्कृतिक निरंतरता को भी बनाए रखती है।
निष्कर्षतः, यह कृति परंपरा और तकनीक का अद्भुत संगम है—जहाँ एक ओर प्राचीन आस्था की जड़ें हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक युग की डिजिटल शाखाएँ। ‘दिगंबर जैन तीर्थ निर्देशिका’ निस्संदेह जैन समाज की एक ऐसी अनुपम कृति है, जिसने न केवल वर्तमान को दिशा दी है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक सुदृढ़ मार्ग प्रशस्त किया है।
निम्नलिखित पते से उक्त निर्देशिका प्राप्त की जा सकती है-
हसमुख जैन गांधी
211 देवधर काम्प्लेक्स , छावनी
इंदौर 452001 म प्र
मोबा 9302103513
मूल्य- मात्र 150/- एवं 60/- पोस्टेज

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