प्राकृत साधना का महापर्व: नवागढ़ में त्रिदिवसीय प्रशिक्षण शिविर—संस्कृति, साधना और शिक्षा का संगम

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प्राकृत साधना का महापर्व: नवागढ़ में त्रिदिवसीय प्रशिक्षण शिविर—संस्कृति, साधना और शिक्षा का संगम

रत्नेश जैन रागी /राजेश रागी बकस्वाहा)

बकस्वाहा /- निकटवर्ती जैन तीर्थ नवागढ़ मे प्राकृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रसार के उद्देश्य से प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन एवं श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र नवागढ़ के संयुक्त तत्वावधान में 12 से 14 अप्रैल 2026 तक त्रिदिवसीय प्राकृत भाषा प्रशिक्षण शिविर का भव्य आयोजन किया जा रहा है। यह शिविर प्रागैतिहासिक एवं पवित्र तीर्थस्थल नवागढ़ में आयोजित होगा, जहाँ देशभर से विद्वान, शिक्षक एवं साधक सहभागिता करेंगे।
इस आध्यात्मिक एवं शैक्षणिक आयोजन को आदिसागर अंकलीकर परम्परा के चतुर्थ पट्टाचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज की प्रेरणा प्राप्त है, साथ ही आचार्य श्री समयसागरजी महाराज, आचार्य श्री वसुनंदीजी महाराज, आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज एवं आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज का मंगल आशीर्वाद भी इस शिविर को प्राप्त होगा।
प्राकृत भाषा, जो भारतीय संस्कृति की प्राचीनतम अभिव्यक्तियों में से एक है, केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि सरलता, अहिंसा, करुणा और आध्यात्मिक चेतना का सशक्त आधार है। यही वह भाषा है जिसमें जैन आगमों की दिव्य वाणी निहित है, जो मानव जीवन को संयम, शांति और आत्मबोध की दिशा प्रदान करती है। वर्तमान समय में इस भाषा का पुनर्जागरण अत्यंत आवश्यक है, और इसी उद्देश्य से यह शिविर एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।
शिविर में प्रतिभागियों को प्राकृत भाषा के विविध आयामों से परिचित कराया जाएगा, जिसमें प्राकृत व्याकरण, साहित्य का इतिहास, ब्राह्मी लिपि, शिक्षक उत्तरदायित्व, तथा प्राकृत विज्ञान, समय विज्ञान, लेश्या विज्ञान एवं सल्लेखना विज्ञान जैसे गूढ़ विषयों का गहन प्रशिक्षण दिया जाएगा। दैनिक कार्यक्रम के अंतर्गत प्रातःकालीन योग, पूजन, विभिन्न प्रशिक्षण सत्र, परिचर्चा एवं आध्यात्मिक संवाद शामिल रहेंगे।
इस अवसर पर प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. आशीष जैन आचार्य ने कहा कि “प्राकृत भाषा हमारी आत्मा की भाषा है, यह हमें हमारे मूल से जोड़ती है और जीवन में सरलता, संयम तथा आध्यात्मिकता का संचार करती है। इस प्रकार के प्रशिक्षण शिविर प्राकृत के पुनर्जागरण में मील का पत्थर सिद्ध होंगे।”, वहीं प्रशिक्षण शिविर के निदेशक ब्र. जयकुमार जैन निशांत (टीकमगढ़) ने अपने उद्बोधन में कहा कि “प्राकृत भाषा केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यदि इसे व्यवहार में उतारा जाए तो समाज में नैतिकता, शांति और मानवीय मूल्यों का विकास संभव है। इस शिविर के माध्यम से हम नई पीढ़ी को इस अमूल्य धरोहर से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।”
आयोजकों द्वारा सभी प्रतिभागियों से अनुरोध किया गया है कि वे 11 अप्रैल की रात्रि तक अथवा 12 अप्रैल प्रातः 7:30 बजे तक अनिवार्य रूप से पहुँचकर शिविर को सफल बनाने में सहयोग प्रदान करें। साथ ही गरिमापूर्ण भारतीय वेशभूषा धारण करना अनिवार्य रहेगा। त्यागी एवं व्रतधारी अतिथियों के लिए शुद्ध एवं पृथक भोजन व्यवस्था उपलब्ध रहेगी, वहीं आमंत्रित शिक्षकों को द्वितीय श्रेणी रेल या बस का वास्तविक यात्रा व्यय भी प्रदान किया जाएगा।
12 अप्रैल प्रातः 8 बजे उद्घाटन सत्र एवं 14 अप्रैल दोपहर 2 बजे समापन समारोह आयोजित होगा। आयोजन स्थल तक पहुँचने हेतु सागर, टीकमगढ़, बड़ागाँव एवं ललितपुर से सुगम मार्ग उपलब्ध हैं तथा बड़ागाँव से नवागढ़ तक वाहन व्यवस्था भी आयोजकों द्वारा की गई है।
इस आयोजन में प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन के अध्यक्ष प्रो. ऋषभचन्द जैन फौजदार (दमोह), महामंत्री डॉ. आशीष जैन आचार्य (शाहगढ़) एवं निदेशक ब्र. जयकुमार जैन निशांत (टीकमगढ़) के साथ-साथ श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र नवागढ़ के अध्यक्ष एड. सनतकुमार जैन (ललितपुर) एवं महामंत्री श्री वीरचन्द जैन नैकोरा की विशेष भूमिका रहेगी। शिविर के सफल संचालन हेतु प्रशिक्षण प्रभारी डॉ. शैलेष जैन (उदयपुर), शिविर समन्वयक अरुण जैन शास्त्री (जबलपुर), शिविर संयोजक सुनील जैन शास्त्री (बड़गाँव) एवं क्षेत्र मैनेजर श्री प्रवीण जैन (नवागढ़) सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।
“प्राकृत केवल भाषा नहीं, बल्कि जीवन की सरलता और आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति है—आइए, इस साधना से जुड़ें।”

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