प्राकृत–अपभ्रंश श्रुत-संस्कृति के अप्रतिम उपासक प्रो. राजाराम जैन जी का महाप्रयाण : एक अपूरणीय क्षति
– डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर
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प्राकृत, अपभ्रंश और जैनदर्शन की अक्षय साधना से भारतीय ज्ञान-परंपरा को समृद्ध करने वाले पद्मश्री सम्मानित प्रो. राजाराम जैन जी का देहावसान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक जीवंत युग का अंत है। उनके निधन से विद्वद्जगत् ने ऐसा मनीषी खो दिया है, जिसकी क्षतिपूर्ति निकट भविष्य में असंभव प्रतीत होती है। वे चलते-फिरते विश्वविद्यालय थे—जहाँ ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि उनके विनम्र व्यक्तित्व, सरल स्वभाव और अनथक साधना में सजीव रूप से प्रवाहित होता था।
१ फरवरी १९२९ को बुंदेलखंड अंचल के सागर जनपद अंतर्गत मालथौन ग्राम में जन्मे प्रो. राजाराम जैन जी ने अल्प आयु से ही अध्ययन, अनुसंधान और साधना को जीवन का लक्ष्य बना लिया था। बनारस में स्याद्वाद महाविद्यालय तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए उन्हें सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महागुरु का सान्निध्य प्राप्त हुआ। यह सान्निध्य उनके चिंतन और लेखन में आजीवन परिलक्षित होता रहा—जहाँ परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय स्पष्ट दिखाई देता है।
प्राकृत शोध संस्थान, वैशाली; मगध विश्वविद्यालय तथा अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्यापन कार्य करते हुए उन्होंने शोधार्थियों की अनेक पीढ़ियों को संस्कारित किया। प्राचीन प्राकृत एवं अपभ्रंश पांडुलिपियों के संपादन, संरक्षण और व्याख्या के क्षेत्र में उनका योगदान भारतीय बौद्धिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। दुर्लभ पांडुलिपियों को खोजकर, संपादित कर, उन्हें लोक और विद्वत समाज के समक्ष प्रस्तुत करना उनके जीवन का साध्य था। यही कारण है कि उनके द्वारा संपादित ग्रंथ केवल अकादमिक कृतियाँ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
लगभग चालीस से अधिक प्रकाशित ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने जैन विद्या, प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाई। राष्ट्रपति सम्मान (२०००) , पद्मश्री सम्मान, अटल सम्मान जैसे अलंकरण उनके तपस्वी बौद्धिक जीवन की स्वाभाविक स्वीकृति थे। किंतु इन सम्मानों से कहीं अधिक मूल्यवान उनकी वह साधना थी, जो जीवन के अंतिम क्षण तक अक्षुण्ण रही। नोएडा स्थित धवलगिरि निवास में भी वे ग्रंथों से घिरे रहते थे।
उनकी धर्मपत्नी डॉ. विद्यावती जैन जी स्वयं उच्चकोटि की विदुषी थीं। यह विद्वान दंपति ज्ञान-साधना का दुर्लभ उदाहरण था, जिसने संयुक्त रूप से अनेक ग्रंथों के संपादन में अनुकरणीय परिश्रम किया। विगत वर्ष उनके देहावसान के पश्चात् भी प्रो. जैन का जीवन अध्ययन और लेखन की तपस्या में ही रमा रहा।
मेरे लिए यह परम सौभाग्य का विषय रहा कि ऐसे महामनीषी का स्नेह और मार्गदर्शन जीवन में प्राप्त हुआ। श्री स्याद्वाद महाविद्यालय, वाराणसी में आचार्य कक्षा के अध्ययनकाल के दौरान पर्यूषण पर्व के अवसर पर प्रवचनार्थ आरा (बिहार) जाने का अवसर प्राप्त हुआ। उसी क्रम में तत्त्वार्थसूत्र की कक्षा एवं प्रवचनों में आदरणीया डॉ. विद्यावती जैन जी का नियमित रूप से उपस्थित रहना—यह तथ्य उस समय मेरे लिए पूर्णतः अनजाना था।
इसका साक्षात्कार तब हुआ, जब वे स्वयं स्नेहपूर्वक भोजन के लिए आमंत्रित करने पधारीं। यद्यपि आदरणीय प्रो. राजाराम जैन जी से पूर्व परिचय था, किंतु आदरणीया डॉ. विद्यावती जैन जी से यह मेरी प्रथम साक्षात् भेंट थी। उनके निवास पर पहुँचे पर जो आत्मीयता, वात्सल्य और श्रुत-संस्कारों से आप्लावित स्नेह प्राप्त हुआ, वह शब्दों की परिधि से परे है।
आदरणीय प्रो. राजाराम जैन जी एवं आदरणीया डॉ. विद्यावती जैन जी ने शाल एवं श्रीफल प्रदान कर जिस गरिमा के साथ मेरा सम्मान किया, वह मेरे जीवन की अमूल्य स्मृतियों में सदैव अंकित रहेगा।
मेरे लेखन और वक्तृत्व-शैली की मुक्तकंठ से की गई उनकी प्रशंसा ने मुझे आत्मविश्वास ही नहीं, अपितु उत्तरदायी बौद्धिक साधना की दिशा भी प्रदान की।
उसके पश्चात् भी अनेक अवसरों पर उनका आशीर्वाद, मार्गदर्शन एवं प्रेरणा प्राप्त होती रही। ऐसे महामनीषी दंपति का सान्निध्य मिलना मेरे जीवन की अमूल्य पूँजी है, जिसे मैं जीवनपर्यंत श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ स्मरण करता रहूँगा
आज, जब प्रो. राजाराम जैन जी हमारे मध्य नहीं हैं, तब यह रिक्तता केवल जैन विद्या की नहीं, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य और शिक्षा-जगत् की है। ऐसे महामनीषी का वियोग अपूरणीय है। उनकी विद्वत्ता, सादगी, विनम्रता और ज्ञान-निष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।
दिवंगत भव्यात्मा को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यही मंगलकामना है कि उन्हें सुगतिगमन, बोधिलाभ एवं शीघ्र निर्वाण की प्राप्ति हो।
उनका कृतित्व अमर है—और उसी में वे सदा जीवित रहेंगे।














