प्रज्ञा को प्रसन्नता से वर्धमान करने पर परमात्मा पद प्राप्त होकर पदमप्रभु भगवान बनते हैं जैन संत आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महामुनिराज
पदमपुरा/कोडरमा**जयपुर नगरी में अतिशय कारी पदमपुरा के अतिशय क्षेत्र में आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी के शिष्य आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी (6 पीछी) तथा आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी (18 पीछी) का आगमन हुआ। आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी ससंघ के साधुओं ने, आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी, पदमपुरा अतिशय क्षेत्र कमेटी और हजारो भक्तों ने दोनों संघों की मंगल अगवानी की। दोनों आचार्य संघ ने जिनालय में देवाधिदेव अतिशय कारी 1008 श्री पदमप्रभु के दर्शन कर आचार्य श्री 108 वर्धमान सागरजी के दर्शन कर आचार्य भक्ति पूर्वक चरण वंदना की। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, आचार्य श्री प्रज्ञा सागरजी, आचार्य श्री प्रसन्नसागर जी एवं आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी के मंचासीन होने पर दोनों आचार्यों ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन किए। धर्म सभा में अनूठा संयोग अतिशय हुआ जब दिगंबर धर्म
की तीनों परंपरा मंच पर प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी परंपरा के आचार्य श्री वर्धमान सागर, आचार्य श्री आदि सागर परंपरा के आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी एवं अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी एवं आचार्य श्री शांति सागरजी छाणी परंपरा की आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी मंचासीन हुई। धर्मसभा में आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी ने उपदेश में 12 तप के बारे में बताया, जैन समाज की पहचान दिगंबर साधुओं से होती है तीर्थंकर भगवान यथानाम, तथागुण अनुरूप होकर असंभव को संभव बनाते हैं।
अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने आचार्य प्रज्ञा सागर जी ओर स्वयं के ब्रह्मचारी अवस्था के संस्मरणों को साझा किया। आचार्य श्री तरुण सागर जी की स्मृति से भावुक हो गए। प्रभु सानिध्य से भक्ति में वृद्धि होती हैं। आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी ने बताया कि 12 वर्ष पूर्व दाहोद में 23 फरवरी 2014 को हमारा मिलन हुआ आपने बताया कि तप, ज्ञान, संयम में वृद्धि होने से प्रज्ञा, प्रसन्न होकर जीवन वर्धमान होता हैं। इस अवसर पर आशीर्वचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में बताया कि पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में आचार्य प्रज्ञा सागर जी एवं आचार्य प्रसन्न सागर जी संघ सहित आए हैं आप दोनों आचार्य पुष्पदंत सागर जी के शिष्य हैं जिस समय सन 1990 में पारसोला में आचार्य पद हमें प्राप्त हुआ था तब यह दोनों मुनि युवा अवस्था में विद्यमान रहे। साधु का लक्ष्य साधना से प्रसन्नता को प्राप्त होता है और प्रज्ञा बढ़ने से जीवन आगे बढ़ कर वर्धमान होता है। तब परमात्मा बनने की यात्रा प्रारंभ पदमप्रभ बनते है यह मंगल देशना वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ने पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्म सभा में प्रगट की। राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आगे उपदेश में बताया कि सब साधु एक है दोनों आचार्यों के दादा गुरु आचार्य श्री विमल सागर जी से हमने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया था। संसारभोगी है और तीर्थंकर भोग से रहित होकर भगवान बने हैं हम सब साधना का लक्ष्य लेकर संयमी बने हैं पीयूष सागर के पिता ने हमसे दीक्षा लेकर मुनि देवेंद्र सागर जी बने तथा देवेंद्र सागर जी के ि हमारे दीक्षागुरु आचार्य धर्मसागर जी से दीक्षा लेकर मु सागर जी बने। आज अष्टमी होने से अधिकांश साधुओं के उपवास रहे।राजेश पंचोलिया से प्राप्त जानकारी संकलन कर्ता अभिषेक जैन राजगंजमंडी,कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार जैन अजमेरा,मनीष जैन सेठी,, झुमरीतिलैया

















