पथभ्रष्ट युवा पीढ़ी,जला रही संस्कारों की होली।

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विजय कुमार जैन राघौगढ़ म.प्र.
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व्यक्ति के जीवन में संस्कारों का बड़ा महत्व होता है। संस्कारों की प्रथम पाठशाला मां होती है।
कहते हैं कुम्हार मिट्टी को जैसा आकार देता है वैसा ही घड़ा बन जाता है। जितने भी महापुरुष हुए हैं वे संस्कारों की सीढ़ी पर चढ़कर ही जीवन के हर क्षेत्र में सफल हुए हैं।संस्कारों से ही संस्कृति की रक्षा होती है। वर्तमान में मां-बाप बच्चे को अच्छे संस्कार देने को जागरुक नहीं है। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण एवं वर्तमान भौतिक चकाचौंध में वहकर युवा पीढ़ी संस्कार को भूलकर पतन की ओर अग्रसर हो रही है। युवा पीढ़ी को ही पतन के लिए दोषी नहीं ठहरा सकते,कुसंस्कार के लिए हम भी दोषी हैं। बालक को गर्भावस्था में मां से संस्कार मिलते हैं। महान योद्धा अभिमन्यु को चक्रव्यूह में प्रवेश की शिक्षा अपनी माता से गर्भ में मिली थी। संस्कारों से चरित्र का निर्माण होता है। जिसका चरित्र उज्जवल होता है उसकी पूजा होती है। संस्कारों को वृति कहते हैं, वृति से ही हमारी प्रवृत्ति बनती है। आज से लगभग 50 वर्ष पहले चलकर हम देखें तो बालक को जन्म के साथ ही माता-पिता अच्छे संस्कार प्रदान कर सफल जीवन की ओर बढ़ाते थे। बालक बालिकाओं की सह शिक्षा का निषेध था। बालक बालिकाओं की दैनिक गतिविधियों पर परिवार की पैनी नजर रहती थी। वर्तमान में युवा पीढ़ी में जो संस्कारविहीनता आई है।उनसे आप भली-भांति परिचित हैं। प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, प्रत्येक शनिवार को क्लवों में युवक युवतियों की नाईट आउट पार्टियां,गर्भपात, भ्रूण हत्या, विवाह पूर्व  फिल्मांकन, मोबाइल की गंदी आदत से आत्महत्या करना, हुक्का पब क्लवों में नशाखोरी, बिना विवाह किये लिव इन रिलेशनशिप में रहना,माता-पिता को वृद्धा आश्रम में रहने की मजबूरी, अनैतिक  तरीके से धन उपार्जन करना। आदि अनेक गलत आदतें युवा पीढ़ी में बढ़ रही है। वर्तमान में युवा पीढ़ी उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रशासनिक एवं तकनीकी पदों पर आसीन हो रहे है। विदेश जाकर नौकरी करने की स्पर्धा चल रही है। मेरा मत है कि हम नौकरी या व्यवसाय करें, मगर हमें अपने मूलभूत संस्कारों का पालन करते हुए कार्य करना चाहिए।आधुनिक संचार क्रांति मोबाइल, इंटरनेट, फेसबुक, इंस्ट्राग्राम,ट्यूटर के जितने लाभ है उससे ज्यादा इन सुविधाओं का दुरुपयोग हो रहा है। युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट करने में इनका पूर्ण योगदान है। प्रात: काल उठकर शुद्ध वस्त्र पहनकर मंदिर में दर्शन करने जाना,पानी छानकर पीना, रात्री भोजन नहीं करना आदि मूलभूत आचरण अब परिवार के वरिष्ठ जनों के जिम्मे रह गये हैं।परिवार में कुलाचार का पालन होता था, हम कुलाचार को भूल गए हैं।  कुलाचार के पालन से दुराचार से बचते थे, मुनिराज, साधु संत निरंतर युवा पीढ़ी को सद् मार्ग  पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। क्रांतिकारी राष्ट्रसंत समाधिस्थ  मुनि तरुण सागर जी महाराज  ने छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्हें तीन संकल्प दिलाये  थे। 1, जीवन में निराश होकर कभी आत्महत्या नहीं करूंगा। 2. वृद्ध माता-पिता का सम्मान करुंगा, अपने परिवार के साथ रखूंगा। 3. देश प्रेम की भावना से कमी नहीं करूंगा। सराकोद्धारक समाधिस्थ आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ने शाहदरा दिल्ली में विगत वर्षों विशाल आम सभा को संबोधित करते हुए युवा पीढ़ी को आह्वान किया था कि माता-पिता का ही बेटा है तो वह संकल्प ले कि माता-पिता को छोड़कर विदेश नौकरी के लिए नहीं जाएगा। दो बेटे हैं तो एक नौकरी करेगा, दूसरा अपना पारिवारिक व्यवसाय करेगा। आचार्य गुरुवर विद्या सागर जी महाराज के परम प्रिय शिष्य तीर्थ उद्धारक संस्कार प्रणेता निर्यातक श्रमण मुनि सुधासागर जी महाराज का स्पष्ट कहना है युवा पीढ़ी को संस्कार विहीन एवं पथभ्रष्ट बनाने माता पिता ही दोषी हैं।माता पिता बचपन से ही अपने बच्चों पर ध्यान नहीं देते हैं। बच्चों को शैशव अवस्था में ही मां उन्हें मोबाइल देकर मोबाइल में गेम देखने की आदत डाल देती है।और बच्चे युवावस्था में पथ भ्रष्ट हो जाते हैं।देश में युवाओं में संस्कारों की अलख जगा रहे सुप्रसिद्ध श्वेतांबर जैन मुनि चंद्रप्रभ जी महाराज ने मंगल प्रवचन करते हुए कहा  जिस परिवार में माता-पिता का सम्मान नहीं होता है परिवार मरघट के समान है। दिगंबर जैन मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने  प्रवचन करते हुए कहा आप कितना भी पैसा कमा लें आपका चरित्र उज्जवल नहीं है तो सब बेकार है। चरित्र का निर्माण तभी होता है जब संस्कारों की शिक्षा दी जाएगी।  मुनिराज ने माताओं को प्रेरणा दी कि आप जितना ध्यान अपने बेटे की शिक्षा पर देती हैं उतना ही ध्यान उसे संस्कार देकर चरित्रवान बनाने दें। आचार्य विद्यासागर जी महाराज के प्रिय शिष्य ऐलक सिद्धांत  सागर जी महाराज देश भर में संस्कार मेला लगाते हैं।साधु संतों से हमें संस्कारवान बनकर अच्छा जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है अपने उपदेशों को जीवन में उतारने वालों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। जैन मुनियों साध्वियों का प्रवास होता है वह लड़कियों को यह संकल्प दिलाते हैं कि मंदिर जी एवं प्रवचन सभा में आधुनिक वस्त्र जींस टॉप पहनकर  नहीं आना है। मगर बिडंवना यह है कि जब तक संत विराजमान रहते हैं, उनके संकल्प का पालन होता है उनके विहार करते ही आधुनिक वस्त्र पहनना चालू हो जाता है। प्राचीन काल में महिलाओं से कुल की मर्यादा का पालन कराया जाता था।  लड़कियों व महिलाओं का पहनावा ऐसा होना चाहिए जिसे पहनकर संस्कृति की रक्षा हो।संस्कार विहीन युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट होने से रोकने समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए युवा पीढ़ी संस्कार विहीन होगी तो समाज व देश की संस्कृति की रक्षा कैसे होगी।
नोट-लेखक स्थायी अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार एवं भारतीय जैन मिलन के राष्ट्रीय संरक्षक हैं।
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