पर्यूषण महापर्व तृतीय दिन , 30 अगस्त पर विशेष

0
5
पर्यूषण महापर्व तृतीय दिन , 30 अगस्त  पर विशेष :
उत्तम आर्जव : सरलता और सत्य का उत्सव
– डॉ सुनील जैन संचय,ललितपुर
पर्यूषण महापर्व आत्मा की शुद्धि का पर्व है। इसमें दस धर्मों का अनुशीलन किया जाता है। आज का दिन उत्तम आर्जव धर्म का है। आर्जव का अर्थ है—मन, वचन और शरीर में सरलता, सीधापन और निष्कपटता। जहाँ छल, कपट और पाखंड नहीं होता, वहीं आर्जव का वास होता है।
आर्जव का आध्यात्मिक संदेश
जैन शास्त्रों में कहा गया है—माया और कपट का परित्याग ही आर्जव है। मन में आर्जव – ईर्ष्या, द्वेष और कपट से रहित भाव। वचन में आर्जव – सत्य, मधुर और हितकारी भाषा। काय में आर्जव – आचरण और व्यवहार में सच्चाई व सरलता।
आर्जव धर्म का अर्थ है— मन, वाणी और कर्म की पवित्रता और यह पवित्रता ही किसी व्यक्ति को महान बनाती है। आर्जव धर्म —   योगस्यावक्रता आर्जव। मन ,वचन ,काय लक्षण योग की सरलता व कुटिलता का अभाव उत्तम आर्जव धर्म हैं। जो विचार हृदय में स्थित हैं ,वही वचन में कहता है और वही बाहर फलता है ,यह आर्जव धर्म हैं। डोरी के दो छोर पकड़ कर खींचने से वह सरल होती है ,उसी तरह मन में से कपट दूर करने पर वह सरल होता है अर्थात मन की सरलता का नाम आर्जव हैं।
महापुरुष जो कहते हैं, वही करते हैं, किन्तु कुटिल पुरुषों की कथनी और करनी में अन्तर होता है। यह मायाचार है। शास्त्रों में इसे त्याज्य बताया गया है। आज सर्वत्र मायाचार या छल—कपट का साम्राज्य है। आज  धर्म के क्षेत्र  में भी मायाचार देखा जा सकता है। इस धर्म का ध्येय है कि हम सब को सरल स्वभाव रखना चाहिए, मायाचारी त्यागना चाहिए।
आजकल सभ्यता के नाम पर भी बहुत – सा मायाचार चलता है ,बिना लाग-लपेट के कहीं गई सच्ची बात तो लोग सुनना भी पसंद नहीं करते। यही भी एक कारण है कि लोग अपने भाव सीधे रूप में प्रकट न करे एड़े-टेड़े रूप में व्यक्त करते हैं। सभ्यता के विकास ने आदमी को बहुत-कुछ मिठबोला बना दिया है। आज के आदमी के लिए ऊपर से चिकनी-चुपडी बातें करना और अन्दर से काट करना एक साधारण-सी बात हो गई है। वह यह नहीं समझता कि यह मायाचारी दूसरों के लिए ही नहीं, स्वयं के लिए भी बहुत खतरनाक साबित हो सकती है, उसके सुख-चैन को भंग कर सकती है। भंग क्या कर सकती है, किए रहती है।
जैनाचार्य कहते हैं कि -‘योगस्यावक्रता आर्जवम्’ । मन—वचन—काय की सरलता का नाम आर्जव है। ऋजु अर्थात् सरलता का भाव आर्जव है। अर्थात् मन—वचन—काय को कुटिल नहीं करना, इस मायाचारी से अनंतों कष्टों को देने वाली तिर्यंच योनि मिलती है।
जो बात मन में है, उसे ही वचन द्वारा प्रकट करना आर्जव है और उससे विरुद्ध मायाचार है, अधम है। अपनी मन: स्थिति को व्यक्त करना शुभ है, मन की बात छिपाकर बनावटी बात मुंह से कहना अशुभ का संकेत है। धर्म में प्रवेश करने के लिए इस मायाचार से मुक्त होना आवश्यक है।
 जो साधक मन में कुटिल विचार नहीं रखता, वचन से कुटिल बात नहीं कहता, शरीर से भी कुटिल चेष्टा नहीं करता तथा अपना दोष नहीं छिपाता, वही उत्तम आर्जव धर्म का पालक है। जितने सरल हम अपने जीवन में होते जाएंगे, उतने ही हम ईश्वरत्व के समीप होते जाएंगे। कोई भी व्यक्ति परमात्मा का भक्त तब तक नहीं हो सकता, जब तक उसमें मायाचार का अंश भी विद्यमान है। मायाचारी अपने कपट व्यवहार को कितना ही छिपाए, देर-सबेर वह प्रकट होता ही है। इसीलिए कहा गया है – नहीं छिपाए से छिपे, माया ऐसी आग, रुई लपेटी आग को, ढांके नहीं वैराग। आज का मानव बहुरूपिया है। उसका स्वभाव जटिलताओं का केंद्र बन गया है। रिश्तेदारों के साथ, अतिथियों तथा अड़ोस-पड़ोस में बसने वालों के साथ -हर किसी के साथ और हर स्थान पर वह छल से पेश आता है। यहां तक कि भगवान के आगे भी वह अपनी मायाचारी बुद्धि का कमाल दिखाए बगैर नहीं रहता।
जीवन में आर्जव का महत्व :
1. आध्यात्मिक साधना में – कपटी साधक कभी मोक्षमार्ग पर प्रगति नहीं कर सकता।
2. सामाजिक जीवन में – आर्जव से विश्वास, प्रेम और सहयोग की भावना विकसित होती है।
3. व्यवहार में – आर्जव धर्म हमें दिखावा, पाखंड और छल से मुक्त करता है।
आर्जव धर्म की साधना : अपने मन में कपट और दिखावे को त्यागें। वाणी को सदैव सत्य, मधुर और हितकारी बनाएं। व्यवहार में सरलता और पारदर्शिता रखें। सभी जीवों के प्रति समान दृष्टि से देखें।
भक्तिपरक संकल्प: आज के इस उत्तम आर्जव धर्म दिवस पर हम सब यह संकल्प लें—हम जीवन में सरल और सच्चे रहेंगे। छल, कपट और पाखंड से दूर रहकर स्वच्छ हृदय बनाएंगे। हर परिस्थिति में सत्य और निष्कपटता का पालन करेंगे। आर्जव धर्म को अपनाकर आत्मा को निर्मल बनाने का प्रयास करेंगे।
निष्कर्ष : सभी को सरल स्वभाव रखना चाहिए,   कपट को त्याग करना चाहिए। कपट के भ्रम में जीना दुखी होने का मूल कारण है ।
उत्तम आर्जव धर्म हमें सिखाता है कि मोह-माया, बुरे  काम सब छोड़ -छाड़ कर सरल स्वभाव के साथ परम आनंद मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।
आर्जव धर्म हमें यह प्रेरणा देता है कि—
“सरल बनो, सच्चे बनो, छल-कपट छोड़ो और आत्मा की निर्मलता की ओर बढ़ो।”
इसी में जीवन का वास्तविक सौंदर्य और मोक्षमार्ग की सच्ची साधना निहित है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here