पदमपुरा की पावन धरा पर प्रथम बार हुआ तीन धाराओं के चार दिगम्बर जैन संघों के 57 दिगम्बर जैन संतों का हुआ महा संगम

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पदमपुरा की पावन धरा पर प्रथम बार हुआ तीन धाराओं के चार दिगम्बर जैन संघों के 57 दिगम्बर जैन संतों का हुआ महा संगम

अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ससंघ (16 पिच्छिका ) एवं आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ससंघ (6 पिच्छिका ) का 12 साल बाद पदमपुरा में सोमवार को हुआ भव्य मिलन

प्रज्ञा को, प्रसन्नता से, वर्धमान करने पर परमात्मा पद प्राप्त होकर पदमप्रभ भगवान बनते हैं

आचार्य वर्धमान सागर

फागी संवाददाता
जयपुर 9 फरवरी -जैन धर्म के छठे तीर्थंकर भगवान पदमप्रभू की भू गर्भ से प्रकटित अतिशयकारी प्रतिमा एवं अति सुन्दर जिनालय के विश्व प्रसिद्ध दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र पदमपुरा (बाड़ा )में सोमवार 9 फरवरी को
साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्य 108 प्रसन्न सागर महाराज ससंघ (16 पिच्छीका ) एवं आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ससंघ (6 पिच्छीका ) का 12 साल बाद भव्य मिलन हुआ। इस मौके पर आयोजित मिलन समारोह में आसमान जयकारों से गुंजायमान हो उठा। भव्य मिलन के बाद बैण्ड बाजों के साथ अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इस मौके पर बडी संख्या में श्रद्धालु एवं गुरु भक्त शामिल हुए। दोनो संघों के मंगल प्रवेश के पावन अवसर पर पदमपुरा में प्रवासरत पंचम पट्टाचार्य वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्धमान सागर महाराज ससंघ (32 पिच्छीका ), गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ (3 पिच्छीका ) से भव्य मिलन हुआ, कार्यक्रम में जैन महासभा के प्रतिनिधि राजाबाबू गोधा ने बताया कि प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में चार दिगम्बर जैन संघों के 57 संतों आर्यिकाओं माताजी का भव्य मिलन हुआ ।
कार्यक्रम में क्षेत्र कमेटी के यशस्वी अध्यक्ष एडवोकेट सुधीर कुमार जैन एवं मानद् मंत्री एडवोकेट हेमन्त सोगानी ने बताया कि सोमवार को प्रसिद्ध दिगम्बर जैन संत प्रखर वक्ता आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ससंघ का चाकसू की ओर से मंगल विहार हुआ वही अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ससंघ का जयपुर की ओर बीलवा से पदमपुरा के लिए मंगल विहार हुआ। दोनो संघों का प्रातः 9.30 बजे अहिंसा सर्किल पर मंगल मिलन हुआ। इस मौके पर जेबीसी मशीनों के ऊपर चढकर गुरु भक्तों द्वारा गुलाब के पुष्प बरसाए जाकर गुरु मिलन की खुशी मनाई गई, कार्यक्रम में जुलूस संयोजक योगेश टोडरका के निर्देशन में बैण्ड बाजों सहित नाचते गाते, भक्ति में झूमते हजारों श्रद्धालुओं का काफिला मंदिर के लिए विशाल जुलूस के द्वारा रवाना हुआ,मार्ग में श्रद्धालुओं द्वारा जगह जगह पाद पक्षालन एवं मंगल आरती कर संघो की भव्य अगवानी की गई। प्रबंधकारिणी समिति ने जुलूस मार्ग में 108 तोरण द्वार बनाकर स्वागत किया,श्री वीर सेवक मण्डल जयपुर के कार्यकर्ता जुलूस की व्यवस्था बना रहे थे,
गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ ने रास्ते में श्रद्धालुओं के साथ दोनों आचार्य संघों की भव्य अगवानी की। जुलूस के मंदिर जी पहुचने पर मुख्य द्वार पर क्षेत्र कमेटी की ओर से यशस्वी अध्यक्ष सुधीर कुमार जैन एवं मानद् मंत्री हेमन्त सोगानी के नेतृत्व में आचार्य श्री ससंघ की पाद पक्षालन एवं मंगल आरती कर भव्य अगवानी की गई। कार्यक्रम में मूलनायक भगवान पदमप्रभू एवं
मंदिर दर्शन के बाद आचार्य वर्धमान सागर महाराज के सानिध्य में धर्म सभा का आयोजन किया गया, कार्यक्रम में बा. ब्र. प्रियंका दीदी द्वारा मंगलाचरण ” इतनी कृपा गुरुजी बनाये रखना मरते दम तक सेवा में लगाये रखना…. ” के बाद मुनि भक्तों द्वारा भगवान पदमप्रभू एवं चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांति सागर महाराज के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्जवलन किया गया ।
पूर्वाचार्यो का अर्घ्य चढाया गया। इस मौके पर आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज एवं आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ने आचार्य वर्धमान सागर महाराज के चरण प्रक्षालन किए। धर्म सभा में अनूठा संयोग अतिशय हुआ जब दिगंबर धर्म की तीनों परंपरा मंच पर प्रथमाचार्य शांति सागर परंपरा के आचार्य वर्धमान सागर,आचार्य आदि सागर परंपरा के आचार्य प्रज्ञा सागर एवं आचार्य प्रसन्न सागर एवं आचार्य शांति सागर छाणी परंपरा की आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी मंचासीन हुई।धर्मसभा में आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी ने उपदेश में 12 तप के बारे में बताया , जैन समाज की पहचान दिगंबर साधुओं से होती है तीर्थंकर भगवान यथानाम, तथा गुण अनुरूप होकर असंभव को संभव बनाते हैं। आचार्य प्रसन्न सागर ने आचार्य प्रज्ञा सागर और स्वयं के ब्रह्मचारी अवस्था के संस्मरणों को साझा किया,उन्होंने कहा कि प्रभु सानिध्य से भक्ति में वृद्धि होती हैं। सागर में मिलने के लिए आये हैं। कंकर है शंकर बनने आये हैं। सन् 1986 से चार पांच साल प्रज्ञा सागर महाराज के साथ रहने के संस्मरण सुनाए।
आचार्य प्रज्ञा सागर ने बताया कि 12 वर्ष पूर्व गुजरात के दाहोद में 23 फरवरी 2014 को हमारा मिलन हुआ था।वहां भी भगवान पदमप्रभू मूलनायक है और यहां पदमपुरा में भी पदमप्रभू मूलनायक है। उन्होंने बताया कि मैने ही प्रसन्न सागर महाराज को अंतर्मना नाम दिया था।
उन्होंने बताया कि तप,ज्ञान,संयम में वृद्धि होने से प्रज्ञा,प्रसन्न होकर जीवन वर्धमान होता हैं,इस अवसर पर आशीर्वचन में आचार्य वर्धमान सागर ने बताया कि पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में आचार्य प्रज्ञा सागर एवं आचार्य प्रसन्न सागर संघ सहित आए हैं दोनों गणाचार्य पुष्पदंत सागर के शिष्य हैं। जिस समय सन 1990 में पारसोला में आचार्य पद हमें प्राप्त हुआ था तब यह दोनों मुनि युवा अवस्था में विद्यमान रहे ।साधु का लक्ष्य साधना से प्रसन्नता को प्राप्त होता है और प्रज्ञा बढ़ने से जीवन आगे बढ़ कर वर्धमान होता है।तब परमात्मा बनने की यात्रा प्रारंभ पदमप्रभ बनते है।
प्रचार प्रसार संयोजक सुरेश सबलावत के अनुसार आचार्य श्री ने आगे कहा कि सब साधु एक है दोनों आचार्यों के दादा गुरु आचार्य विमल सागर से हमने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया था,संसारभोगी है और तीर्थंकर भोग से रहित होकर भगवान बने हैं हम सब साधना का लक्ष्य लेकर संयमी बने हैं। पीयूष सागर के पिता ने हमसे दीक्षा लेकर मुनि देवेंद्र सागर बने तथा देवेंद्र सागर के पिता ने हमारे दीक्षागुरु आचार्य धर्मसागर से दीक्षा लेकर मुनि जिनेंद्र सागर बनें,
कार्यक्रम में इससे पूर्व अध्यक्ष सुधीर कुमार जैन एवं मानद् मंत्री हेमंत सोगानी ने स्वागत उदबोधन देते हुए पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के कार्यक्रमों की जानकारी दी।
इस मौके पर
एडवोकेट सुधीर जैन दौसा, एडवोकेट हेमन्त सोगानी, ज्ञान चन्द झांझरी, राज कुमार कोठ्यारी, सुरेश काला,महावीर अजमेरा, सुरेश सबलावत,सुभाष चन्द जैन, अशोक जैन नेता, प्रदीप जैन, नरेन्द्र पाण्डया, विनोद जैन कोटखावदा, हरिश धाडूका, धर्म चन्द पहाडियाँ, अशोक छाबड़ा, राज कुमार सेठी, धन कुमार जैन,योगेश टोडरका,राकेश गोधा, अशोक बाकलीवाल, राजाबाबू गोधा सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे,कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन राकेश सेठी ने किया कार्यक्रम में विनोद जैन कोटखावदा ने बताया कि आचार्य वर्धमान सागर महाराज बाड़ा पदमपुरा की पावन धरा चोथी बार आये हैं। पहली बार मुनि दीक्षा के बाद अपने दीक्षा गुरु आचार्य धर्म सागर महाराज के साथ 1969 में आये थे। सन 1980 में शिक्षा गुरु आचार्य कल्प श्रुत सागर महाराज के साथ चातुर्मास किया।
तीसरी बार आचार्य बनने के बाद 25 दिसम्बर 2015 को आये और 45 दिन प्रवास किया। जनवरी 2016 में 111 प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा की गई,संघ में है 29 साल से 81 साल तक के साधु संत आचार्य वर्धमान सागर महाराज 76 वर्ष के है। आर्यिका पद्मयश मति माताजी 29 साल की है। मुनि चिंतन सागर 39 साल के है। मुनि प्रभव सागर महाराज 81 साल की उम्र के है। साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ससंघ (16 पिच्छीका ) एवं आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ससंघ (6 पिच्छीका ) का पदमपुरा में सोमवार, 9 फरवरी को भव्य मंगल प्रवेश होने के बाद पदमपुरा में पहली बार चार संघों के 57 संतों का भव्य महामिलन हुआ।

राजाबाबू गोधा जैन गजट संवाददाता राजस्थान

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