‘निर्वाह और निर्वाण के प्रथम उपदेष्टा तीर्थंकर ऋषभदेव’

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(केंद्रीय विश्वविद्यालय में ऋषभदेव संगोष्ठी एवं आत्मार्थी कन्या विद्यालय के शैक्षणिक टूर का भव्य आयोजन )
नई दिल्ली , जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्मकल्याणक के पावन अवसर पर  प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत केंद्रीय विश्वविद्यालय,नई दिल्ली के जैनदर्शन विभाग में  तीर्थंकर ऋषभदेव संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भगवान ऋषभदेव के जीवन और उनके दर्शन की वर्तमान प्रासंगिकता पर गहन विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ शोध छात्रा अंजलि जैन तथा   आत्मार्थी मान्या जैन के मंगलाचरण के द्वारा हुआ
जिसने संपूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।अनंतर सभी अतिथियों का स्वागत किया गया ।  कार्यक्रम का कुशल संचालन प्रो. डॉ. अनेकांत कुमार जैन तथा शोध छात्रा श्रुति जैन के द्वारा किया गया।
इस अवसर पर आत्मार्थी कन्या विद्यालय,दिल्ली की निदेशिका मुख्य वक्त्री  ब्रह्मचारिणी विदूषी राजकुमारी जी ने अपने प्रेरक वक्तव्य में ‘भगवान ऋषभदेव के राग से वैराग्य की ओर कैसे बढ़े’ इस विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे राजपाट के वैभव को त्याग कर ऋषभदेव विराग पूर्वक आगे बढ़कर पूर्णत्व को प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि उनका जीवन केवल त्याग की गाथा नहीं, बल्कि स्वयं से साक्षात्कार की प्रक्रिया है।
प्रो. वीरसागर जैन जी (विभागाध्यक्ष, जैन दर्शन विभाग) ने भगवान ऋषभदेव को ‘युग पुरुष’ के रूप में चित्रित किया और उनके दार्शनिक पक्ष को शोध की दृष्टि से प्रस्तुत किया।
प्रो. डॉ. अनेकांत कुमार जैन जी ने भगवान ऋषभदेव के जीवन के ऐतिहासिक और आगमिक प्रमाणों को साझा किया। उन्होंने आत्मार्थी कन्यायों को विश्वविद्यालय का परिचय दिया , समस्त पाठ्यक्रमों से उन्हें परिचित करवाया एवं शास्त्री कक्षा में प्रवेश लेने हेतु प्रेरित भी किया । उन्होंने आत्मार्थी कन्या विद्यालय की सभी बारहवीं कक्षा की छात्राओं , निदेशिका,वार्डन निकिता जैन आदि को केंद्रीय पुस्तकालय, वेधशाला,यज्ञशाला सहित पूरे परिसर का भ्रमण करवाया तथा विश्वविद्यालय का विस्तार से परिचय दिया ।
संगोष्ठी की विशेष उपलब्धि शास्त्री, आचार्य के छात्रों और शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत किए गए विचार रहे।जैनदर्शन विभाग के  छात्रों व शोधार्थियों रविन्द्र,सुजय,जेबा,नीरू,अंजलि,पृथ्वीराज,वनमाली, अर्पित,श्रुति व अंकित जैन आदि सभी ने  प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की व्यापकता पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये।आत्मार्थी कन्याओं में  आत्मार्थी मिष्ठी और आत्मार्थी पयांशी ने भी अपने ओजपूर्ण वक्तव्य रखे, जिसमें उन्होंने ऋषभदेव के जीवन से युवा पीढ़ी को मिलने वाली शिक्षाओं पर बल दिया।
इस अवसर पर प्रो. अनेकांत कुमार जैन की पुस्तक ‘ तीर्थंकर ऋषभदेव का सनातन जैन धर्म’ का विमोचन भी किया गया तथा उनकी प्राकृत कृति ‘दसधम्मसारो’ सभी छात्राओं को वितरित की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे आत्मार्थी ट्रस्ट के ट्रस्टी
 श्री नरेश लुहाड़िया जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में संगोष्ठी की सफलता पर हर्ष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन छात्रों के भीतर शोध की प्रवृत्ति और अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव जागृत करते हैं।
कार्यक्रम के अंत में शोधार्थी जे़बा आफरीन ने संक्षिप्त एवं प्रभावपूर्ण शब्दों में शिक्षक गण एवं सभी उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया तथा सभी अतिथियों, विद्वानों और प्रतिभागियों का हृदय से धन्यवाद ज्ञापन किया।
 – शोधार्थी जे़बा आफरीन एवं नीरू जैन ,जैनदर्शन विभाग

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