अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज ससंघ गुलाबी नगरी जयपुर राजस्थान में विराजमान हैं उनके सानिध्य में वहां विभिन्न धार्मिक कार्योंकम संपन्न हो रहें हैं उसी श्रुंखला में आज उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि
नकारात्मक सोच से ही मन दु:खी, परेशान, और हैरान रहता है..और सकारात्मक सोच से मन शान्त और चेहरा प्रसन्न बना रहता है..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
औरंगाबाद/जयपुर। सोच को सकारात्मक बनाने से निगेटिव शब्द भी पोजिटिव हो जाते हैं, जैसे —
मस्त राम मस्ति में, प्रभावना हो वस्ती में।
अपना काम बनता – मन्दिर में जाये जनता।
यदि सीधी उंगली से घी ना निकले तो घी को गर्म कर देना चाहिए।
निगेटिव शब्द से पोजिटिव सोच ऐसे बना सकते हैं, जैसे —
जलन – खुद को बेहतर बनाने का तरीका।
नाराज़गी – संवाद करने को प्रेरित करती है।
हार – अभ्यास का हिस्सा।
दुविधा – सही निर्णय लेने का रास्ता।
अशान्ति – अपने भीतर देखने का अवसर।
डर – आगे बढ़ने की हिम्मत करना, जीत का जज्बा पैदा करना।
आलोचना – बेहतरीन बनने का समय।
निराशा – नई दिशा खोजने का सही समय।
गलती – अनुभवी बनने का पाठ।
अकेलापन – खुद से जुड़ने का अवसर।
दबाव – भीतर की हिम्मत को जगाना।
संघर्ष – भीतर के जुनून को पैदा करना।
कमजोरी – मन को मजबूत करने का वक्त।
अन्धेरा– रोशनी की कद्र करना सिखाता है।
संशय – गहराई से सोचने की शुरूआत।
उदासी – मन को सम्भालने का समय।
थकान – रूकना और मन को समझाना।
हर नकारात्मक शब्द में सम्भावना छिपी है बहुत कुछ करने की, जरूरत है उसे सही नजर से देखने की, क्योंकि सारा खेल मन की सोच का है। मन अच्छा तो सब कुछ अच्छा और मन खराब तो सब कुछ खराब…!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद














