मुक्ति पथ की ओर चले परम पूज्य मुनि मुक्ति सागर जी महा मुनिराज
दिन रात मेरे स्वामी में भावना ये भाऊ देहांत के समय में तुमको न भूल जाऊं
✍️ पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार कोटा की कलम से
पिडावा जिला झालावाड़ (राज)
राणा प्रताप मीरा पन्नाधाय हाड़ी रानी के तप त्याग और साधना की पावन वसुंधरा राजस्थान प्रांत के हाडोती के अंचल के अंतर्गत झालावाड़ जिले की धर्मप्राण नगरी पिड़ावा में मृत्यु महोत्सव का अद्भुत नजारा लोगों को देखने को मिल रहा है समस्त पीड़ावा जैन समाज के साथ युवा पीढ़ी युवा पार्टी का सेवा भाव समर्पण देखते ही बनता है । मन उनके प्रति श्रद्धा से नत मस्तक हो जाता है। पिडावा नगरी में परम पूज्य मुनि ब्रह्मानंद सागर जी महाराज ने अपने जीवन काल के कई चातुर्मास संपन्न किए हैं। मुनि ब्रह्मानंद सागर जी महाराज के व्यक्तित्व और उनके तप संयम साधना से पिडावा के श्रद्धालु बहुत प्रभावित थे।मुनि ब्रह्मानंद सागर जी महाराज से संस्कार और आशीर्वाद पिडावा वालो को मिला जीवन की अंतिम सांस तक नहीं भुला पाएंगे। कई साधु संतों के वर्षायोग हर्षोल्लास के वातावरण में संपन्न हो चुके ह। ऐसी धर्म प्राण नगरी में परम पूज्य आचार्य 108 भूतबली सागर जी महाराज के शिष्य
चतुर्थ कालीन चर्या के महान साधक परम पूज्य, परम तपस्वी गुरुदेव 108 श्री मुक्ति सागर जी महाराज जी की यम संलेखना लगातार 14 दिनों से चल रही है। जैन दर्शन ही मात्र ऐसा दर्शन है जिसमें मृत्यु को महोत्सव के रूप में स्वीकार किया जाता है। शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता को जान कर, मृत्यु की अवश्यंभाविता को पहचान कर सामने आई हुई मृत्यु से घबराये बिना आत्मसाक्षात्कार पूर्वक अपने शरीर को छोड़ने का नाम सल्लेखना है।परम पूज्य मुनि सागर जी महाराज संघ का भी इस अवसर पर पूरा सानिध्य एवं मार्ग दर्शन मिल रहा है। धर्म प्राण नगरी पिडावा में हजारों की संख्या में जैन श्रद्धागण परम पूज्य मुनि मुक्ति सागर जी महाराज के दर्शनार्थ ओर आशीर्वाद लेने आ रहे है। श्रद्धा भक्ति और समर्पण का सैलाब उमड़ रहा है। वास्तव मुनि श्री मुक्ति सागर जी महाराज मुक्ति पथ अर्थात मोक्ष पथ की ओर अग्रसर हो रहे है। हम भी इस समय यही मंगल मय भावना भाए कि जीवन का जब अंत समय आए तो समाधि के साथ ही मरण हो। दुर्लभ चिंतामणि रत्न सामान मानव पर्याय 84 लाख गतियां में भटकने के बाद प्राप्त हुई है इस मानव जीवन का एक एक पल मूल्यवान है । इस मानव पर्याय में संसार शरीर और भोगों से विरक्त हो संयम को धारण करना चाहिए। अंत में यही भावना अंतर्मन में दिन रात मेरे स्वामी में भावना ये भाऊ देहांत के समय में तुमको न भूल जाऊं ।
प्रस्तुति
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी
पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार
कोटा
9414764980
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