(केंद्रीय विश्वविद्यालय दिल्ली में तीर्थंकर महावीर विचार संगोष्ठी संपन्न)
नई दिल्ली, ३० मार्च २०२६,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली के जैन दर्शन विभाग,दर्शन संकाय द्वारा जैनधर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर जन्मकल्याणक (चैत्र शुक्ल त्रयोदशी)के पावन अवसर पर एक विचार संगोष्ठी “तीर्थंकर भगवान् महावीर और उनका जीवन दर्शन” विषय पर आयोजित की गई , जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए राष्ट्रपति सम्मानित विद्वान् प्रो.फूलचंद जैन प्रेमी (पूर्व अध्यक्ष – जैनदर्शन विभाग , सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय ,वाराणसी) ने कहा कि तीर्थंकर भगवान् महावीर ने परस्पर सद्भाव और एकता के लिए अहिंसा,अपरिग्रह,अनेकान्तवाद, स्याद्वाद, सर्वोदय कल्याणकारी और समन्वयकारी जैसे अनेक सिद्धान्तों व जीवन मूल्यों को समाज में प्रतिष्ठापित करने हेतु क्रान्तिकारी कार्य किये । यह ऐसी क्रान्ति थी ,जिसे व्यक्तिगत जीवन का अपूर्व पराक्रम कहा जा सकता है । कथनी और करनी में समानता के प्रबल पक्षधर होने के कारण उन्होंने जो कुछ कहा, उसे उन्होंने स्वयं करके दिखाया।
उन्होंने बताया कि वे शान्तिप्रिय थे और अहिंसा में विश्वास रखते थे । अतः अहिंसक समाज रचना के लिए सदा प्रयत्नशील रहे । उनका कहना था कि समाज परिवर्तन के लिए क्रान्ति आवश्यक है, पर वह क्रान्ति अहिंसक हो । उनका मानना था कि जिस क्रान्ति में हृदय परिवर्तन की क्षमता हो, वही सबसे बड़ी क्रान्ति है । इसीलिए वे जीवन भर सदा विश्वबन्धुत्व की शिक्षा देते रहे. उन्होंने ना तो कभी जातिवाद या वर्ण व्यवस्थाका समर्थन किया, न सम्प्रदायवाद और न कभी क्षेत्रीयतावाद का । मनुष्य को सदा मनुष्य जाति के रूप में देखा। एक ऐसी जाति के रूप में जिसमें न कोई ऊंच हो, न नीच और न कोई बड़ा,न छोटा. वरन पूरा समुदाय स्नेह, सद्भाव, सहयोग, सहकार की धुरी पर खड़ा हो।
संगोष्ठी के आरम्भ में प्राकृत मंगलाचरण शोध छात्रा रिद्धि जैन ने किया तथा संस्कृत मंगलाचरण ब्राह्मी सुंदरी कन्या महाविद्यालय की छात्राओं ने किया । सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रो.कुलदीप ने कहा कि हम स्वयं को न जानकार पर चिंता में लगे रहते हैं , महावीर हमें स्वयं को जानना सिखाते हैं । शोध छात्रा श्रुति जैन ने मुख्य वक्ता का अकादमिक परिचय प्रस्तुत किया एवं अंत में सभी का धन्यवाद ज्ञापन भी किया । संगोष्ठी का सञ्चालन करते हुए जैनदर्शन के आचार्य संगोष्ठी संयोजक प्रो. अनेकांत कुमार जैन ने कहा कि हम विश्वविद्यालय में प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव एवं अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर का जन्मकल्याणक एक गोष्ठी के रूप में अकादमिक रूप से अवश्य मनाते हैं ताकि उनके महान विचारों और सिद्धांतों को बड़े बड़े विद्वानों के मुख से सुनकर विद्यार्थी उनसे परिचित हो सकें । उन्होंने ब्राह्मी सुंदरी कन्या विद्यालय की प्राचार्य डॉ अल्पना जैन एवं छात्राओं के साथ एक विशेष परिचर्चा करके उन्हें विश्वविद्यालय का विस्तृत परिचय दिया तथा प्रवेश हेतु प्रेरित किया ।
इस अवसर पर प्रो. अनेकांत कुमार जैन की पुस्तक ‘ महावीर की आत्मकथा’ का विमोचन किया गया तथा उसे सभी को वितरित किया गया एवं दर्शन संकाय में नव नियुक्त सभी अध्यापकों का विशेष अभिनन्दन किया गया ।
समारोह के अध्यक्ष एवं दर्शन संकाय पीठप्रमुख प्रो.ए.एस. अरावमुदन जी ने भगवान् महावीर के विचारों को आत्मसात करने पर बल दिया । समारोह के मुख्य अतिथि ब्राह्मी सुंदरी कन्या महाविद्यालय,दिल्ली के ट्रस्टी श्री बज्रसेन जैन जी ने शास्त्र की रक्षा में संस्कृत शिक्षा की उपयोगिता बतलाई । छात्र कल्याण प्रमुख प्रो. मार्कंडेय नाथ तिवारी जी ने प्रो. प्रेमी की श्रुत साधना की प्रशंसा करते हुए उनके द्वारा पूरे परिवार को श्रुत साधना में लगाने को ऐतिहासिक और प्रेरणास्प्रद बताया । दर्शन संकाय के सभी आचार्य सहित साहित्य संस्कृति संकाय प्रमुख प्रो. कल्पना जैन आदि विश्वविद्यालय के अनेक आचार्य, शोधार्थी एवं छात्र छात्राओं की गरिमापूर्ण उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढाई । सम्पूर्ण संगोष्ठी का कुशल निर्देशन जैन दर्शन विभाग के अध्यक्ष प्रो.वीरसागर जैन के द्वारा किया गया ।












