कोटा शहर में गणिनी शिरोमणि, भारत गौरव, आर्यिका 105 श्री विशुद्ध मति माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में पंच दिवसीय वृहद गणधर वलय विधान का हुआ भव्य आयोजन
फागी संवाददाता
कोटा शहर में विराजमान प. पू. भारत गौरव , गणिनी शिरोमणि,आर्यिका 105श्री विशुद्ध मति माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में 3 जनवरी से 7 जनवरी 2026 तक चल रहे पंच दिवसीय वृहद गणधर वलय विधान का भव्य आयोजन हुआ कार्यक्रम में जैन महासभा के प्रतिनिधि राजाबाबू गोधा को जानकारी पर ज्ञात हुआ कि उक्त विधान में प. पू.सिद्धान्त वाग्मी , पट्ट गणिनी आर्यिका 105 श्री विज्ञमति माताजी ने बताया कि
24 तीर्थंकरो के 1452 गणधरों का ये महाविधान, सिर्फ विधान नहीं जिनशासन का महासंविधान है,दीक्षार्थी के नवजीवन का नव प्रभात ये विधान ही है, यह व्यक्तिगत पुण्य का विस्तार नहीं अपितु सम्पूर्ण समग्र समाज के जिनशासन प्रभावना का एक नया अध्याय हैं।
तीर्थंकर के सचिव ये गणधर देव ही तीर्थंकर प्रभु की दिव्य देशना को झेला करते है एवं उसे समग्र ब्रह्मांड में विस्तृत कर देते हैं, और तो और तीर्थंकर देव के पादमूल में ही दीक्षा को ग्रहण करते हैं।ऐसे अचिन्त्य पुण्य के अवधारी गणधर देव हुआ करते हैं,ऐसे महिमावंत गणधरों के महिमाशाली गुणों को सुंदर काव्य रूप माला में पिरोकर, प. पू. सिद्धान्त वाग्मी, पट्ट गणिनी आर्यिका105 श्री विज्ञमति माताजी ने आगे बताया कि जो भावों का महाकाव्य “वृहद गणधर वलय विधान”रूप में प्रस्तुत किया है वह अत्यंत ही अद्धभुत एवं अनुपम हैं।
ज्ञात हुआ कि सर्व विघ्नों,व्यवधानों को दूर करने वाला उक्त वृहद गणधर वलय विधान का आयोजन श्री सहस्रफनी पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर स्टेशन कोटा में हर्षोल्लास पूर्वक सम्पन्न हुआ कार्यक्रम में मंगल सानिध्य प्राप्त हुआ प. पू. सिद्धान्त रत्न, भारत गौरव गणिनी शिरोमणि आर्यिका श्री105 विशुद्ध मति माताजी का एवं प्रेरणा का दीप जलाया उन्हीं से प्रसूत बाल ब्रह्मचारिणी, गुरु आज्ञाकारिणी, मंजुल भाषिणी, पट्ट गणिनी आर्यिका105 श्री विज्ञमति माताजी ने, उक्त विधान में सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ श्रीमान विशाल जी, मीनाक्षी जी कंजोलिया परिवार को, मीनाक्षी जी की मेहनत, उत्साह एवं भक्ति का कोई जवाब नहीं था, वर्तमान का उनका ये अथक प्रयास एवं तपोधनो की सेवा का महाप्रसाद उन्हें निश्चित ही सौधर्म स्वर्ग में शची इन्द्राणी का पद प्रदान करेगा, कार्यक्रम में कुबेर इंद्र की भूमिका निभाई गुरु माँ के चरण चंचरीक श्रीमान अशोक जी, ललिता जी लुहाड़िया ने विधान की पूर्व बेला में सौभाग्यशाली पात्रों के हल्दी मेंहदी लगाई गई, मंगलमय ध्वजारोहण से मंगलमय विधान की मंगल शुरुआत हुई।भक्तगणों ने अत्यंत ही भक्ति भाव से जिनभक्ति अर्चना को संपादित किया ऐसा लगा मानो स्वर्गलोक का पूरा परिवार ही यहां उपस्थित हुआ हो आया हो।समवशरण में विराजमान पूज्या पट्ट गणिनी आर्यिका विज्ञमति माताजी की दिव्य देशना भी प्रसारित हुई जिसके माध्यम से उन्होंने बताया कि जिंदगी बहुत सरल है और जिंदगी बहुत कठिन है, सिर्फ उनके लिए जिन्होंने अपने कर्मो में ,अपनी कर्मण्यता में मैं को बसा रखा है, जिसने मैं को हटाकर के हम सब किया है, इसका बिगुल बजाया है वो मित्र नहीं मित्र के रूप में भगवान बन जाता है।इसलियें हमे अपने जीवन मे राम बनना है रावण नहीं, लेकिन रावण बुरा नहीं था अच्छा था, आप बुरे नहीं है आप बहुत अच्छे हैं दुनिया मे कोई बुरा नहीं होता,अगर बुरा कुछ है तो उसकी वृत्ति बुरी हैं उसकी क्रिया, उसकी सोच बुरी है, अगर हमारा सोच अच्छा हो जाये तो आप बहुत सुंदर है।सांध्यकालीन बेला में 1452 दीपमालिका प्रज्वलित कर जिनेंद्र प्रभु की महाआरती की गई।
कार्यक्रम में अंतिम दिवस पर विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन किया गया एवं जिनेंद्र प्रभु की भव्य शोभायात्रा के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
राजाबाबू गोधा जैन गजट संवाददाता राजस्थान
















