जो उत्पन्न होकर कुल को पवित्र करता है वह पुत्र है – मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज  

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कुंडलपुर। सुप्रसिद्ध  सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में विराजमान पूज्य मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा नीतिपरक ग्रंथों में पुत्र की  परिभाषा आचार्यों ने दी है यह परिभाषा बहुत गहरे अर्थ को लेकर कहीं गई है।” य उत्पन्न: पुत्राति वंशं स पुत्र ”  अर्थात जो उत्पन्न होकर वंश को पवित्र करता है वह पुत्र है। कुल किन कारणों से पवित्र होता है और किन कारणों से अपवित्र होता है हमारे ही कुछ ऐसे कृत्य हैं जिनके माध्यम से कुल पवित्र होता है। और हमारे ही कुछ ऐसे कृत्य हैं जिनके माध्यम से कुल कलंकित होता है । सभी कुछ जानते समझते हुए भी अगर हमारे द्वारा गलत कृत्यों की पुनरावृत्ति होती है तो हम क्या कर रहे हैं? हम स्वयं जानते हैं जब भी किसी से कोई पाप होता है तो उसकी अंतरात्मा धिक्कारती है।

बस अगर आपने उस अंन्दर की आवाज को सुन लिया तो आप पुण्यात्मा और सुनकर अनसुना कर दिया तो आप क्या हैं आप स्वयं  जानते हैं ।तत्वार्थ सूत्र ग्रंथ राज में पुण्य और पाप की कितनी सरल परिभाषा मिलती है ।शुभस्य पुण्यस्य अशुभस्य पापस्य अर्थात वे सभी कार्य जो शुभात्मक हैं वे ही पुण्य कार्य है।वे ही पुण्य कर्म का आश्रव करने वाले हैं। और वे ही पुण्य कर्मों को बढ़ाने और बांधने वाले है ।  जो अशुभात्मक कार्य है वे ही पाप कर्म है।वे ही पाप कर्म का आश्रव करने वाले हैं ।वे ही पाप कर्म को बढ़ाने व बांधने वाले हैं ।पाप कार्यों के माध्यम से त्रिकाल में सुख प्राप्त होने वाला नहीं है। क्योंकि पाप कर्म स्वयमेव दुख रूप  है।

जिस प्रकार एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है ।उसी प्रकार एक गलत कार्य भी आपके वंश को अपवित्र कर देता है। वर्तमान का नवयुवक वर्ग शीघ्र धनपति बनने के चक्कर में आज एक ऐसी मानसिकता बना चुका है जिससे मात्र धन और भोगों को ही केंद्र में लक्ष्य में रखकर ही कार्य किया जा रहा है। फिर वह धन किन कार्यों से किन माध्यमों से आ रहा है इस और उसका ध्यान नहीं रहता। इस अनैतिक धनार्जन के लिए वह किसी भी स्तर तक कुछ भी करने पर उतर चुका है। उसके परिणामों की ओर दृष्टिपात करने का भी उसके पास समय नहीं बचा है ।इस चिंतन विहीन नवयुवक पीढ़ी को सही मार्ग पर लाना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

इन गंभीर विषयों पर आज वर्तमान परिपेक्ष में मार्गदर्शन अगर कोई कर सकता है तो वे है राष्ट्र चिंतक आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज। भारत मां के सच्चे लाल जिनका  चिंतन मनन सदैव राष्ट्रहित में ही लगा है ।भारत को अपनी खोई हुई पहचान( नाम, भाषा) आदि विषयों को अपना उपदेश का विषय बना कर उन्होंने संपूर्ण भारत में इसका पर्याप्त प्रचार-प्रसार किया ।भारत को प्रति भारत अर्थात प्रतिभा संपन्न बनाने का उनका चिंतन सतत चलता रहता है ।धन्य है ऐसे भारत मां के सच्चे सपूत जो अपने जन्म को सार्थक कर रहे हैं। अपने इस भारत वंश का गौरव बढ़ा रहे हैं।

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