जीवन जीने की कला सीखाती है दीपावली

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महावीर दीपचंद ठोले, औरंगाबाद 7588044495
दीपावली का असली अर्थ है अंधकार से लड़ना नहीं बल्कि एक छोटा दीप जलाकर उसे मिटा देना।दीपावली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का प्रकाश उत्सव है। इसमें आध्यात्मिकता और सामाजिकता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह हमें अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और निराशा से आशा की ओर बढ़ने का संदेश देता है। छोटे से दीपक की लौ जीवन के गहनतम अंधकार को मिटा देती है और यह तथ्य सिद्ध करती है कि सकारात्मकता का एक दीप हजारों निराशाओं पर भारी होता है।दीपक का छोटा सा रूप जलते हुए हमें जीवन जीने की गहरी प्रेरणा देता है और सीखाता है कि जीवन का अर्थ केवल स्वयं तक सीमित नहीं है। इसलिए वह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है।वह बताता है कि हमें भी अपने भीतर का अहंकार स्वार्थ और लोभ जलाकर समाज व परिवार के लिए उपयोगी बनना चाहिए। इसलिए जब तक भीतर का तेल (त्याग और संयम) उपलब्ध है और बाती (सदाचार व श्रद्धा) सीधी है, तब तक जीवन की लौ प्रज्वलित रह सकती है।यही संदेश मानव जीवन के लिए आवश्यक है—स्वयं तपो, दूसरों के लिए जगमगाओ।
“दीपक बनो तो जलकर राह दिखाओ सबको,
सूरज बनो तो चमककर जीवन जगमगाओ।
अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों ना हो एक छोटा सा दीपक उसे दूर कर देता है ।इसी तरह जीवन की कठिनाइयों और समस्यायों के बीच यदि हम आशा का दीपक जलाए रखें तो निराशा कभी स्थाई नहीं रह सकती।
जैन परंपरा में दीपावली का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया था। उनका जीवन ही एक प्रकाश पुंज था जिसने संसार को अहिंसा ,सत्य और अपरिग्रह का मार्ग दिखाया ।उनकी शिक्षाएँ हमें स्मरण कराती हैं किजीवन का वास्तविक आनंद भोग में नहीं, त्याग और साधना में है।असली दीपावली वह है, जब आत्मा का अज्ञान मिटे और आत्मबोध का प्रकाश जागे।
महावीर का यह संदेश कालातीत है।
दीपावली की रात जैसे अनगिनत दीपक मिलकर घर-आँगन को आलोकित करते हैं, वैसे ही जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने गुणों और कर्मों से प्रकाश फैलाता है तो वातावरण शांति, सौहार्द और समृद्धि से भर उठता है।
यह पर्व हमें बताता है कि—अकेला दीप सीमित प्रकाश देता है, पर अनेक दीप मिलकर अनंत आभा बिखेर देते हैं।इसलिए समाज में सहयोग, समरसता और एकता ही सबसे बड़ा उत्सव है।दीप हमें यह भी सिखाते हैं कि जीवन का प्रबंधन कैसे हो—तेल सीमित है, इसे विवेक से खर्च करना चाहिए।लौ छोटी है, पर उसकी चमक दूर तक जाती है—यानी कर्म छोटे हों पर भाव महान हों।
बाती को सीधा रखना पड़ता है—यानी जीवन में सिद्धांत, संयम और सत्य को दृढ़ बनाए रखना होगा।
दीपावली केवल बाहरी सजावट का पर्व नहीं, बल्कि आत्मा कोआलोकित करने का अवसर है।हमें पटाखों की गूँज नहीं, बल्कि मौन साधना की ध्वनि को सुनना चाहिए।मिठाइयों की मिठास से अधिक, वाणी और व्यवहार की मिठास को बढ़ाना चाहिए। हमें बच्चों को इस पर्व के पीछे का अध्यात्मिक संदेश भी समझना चाहिए और घर की सफाई से अधिक, मन की शुद्धि और आत्मा की पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए। जैसे दीप हमें सिखाते हैं की जलना है तो अपने भीतर के दोषो को जलाओ ।चमकना है तो दूसरों के जीवन में उजाला फैलाओ । जीना है तो आत्मा की रोशनी में जीना सीखो।
“दीप जलाओ पर भीतर भी प्रकाश होना चाहिए,
वाणी मधुर हो पर मन का हृदय भी उज्ज्वल होना चाहिए।महावीर के संदेश से जीवन को सजाओ, अंधेरों में दिया बनो, निराशा में आशा बनो, स्वार्थ की ईस दौर में दूसरों के लिए भाषा बनो।दीपावली को केवल पर्व नहीं, साधना का अवसर बनाओ।”

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