जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल में दशलक्षण पर्व के पंचम दिवस पर ‘उत्तम सत्य’ की पूजा सम्पन्न

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पलवल, 1 सितम्बर 2025।
जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल में दशलक्षण पर्व के पंचम दिवस पर श्रद्धा एवं भक्ति के साथ विविध धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस पावन अवसर पर भूगर्भ से अवतरित चैतन्य चिंतामणि श्री पार्श्वनाथ भगवान का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। तत्पश्चात् ‘उत्तम सत्य’ की विशेष पूजा संपन्न हुई।

इस अवसर पर वक्तव्य देते हुए नितिन जैन, संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल ने कहा कि :

“दशलक्षण पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, यह आत्मा के गुणों को जागृत करने का पवित्र अवसर है। इसके प्रत्येक दिवस में एक ऐसा गुण सामने आता है, जो हमें भीतर से परिष्कृत करता है। पंचम दिवस ‘उत्तम सत्य’ का है, और यदि कहा जाए कि धर्म का संपूर्ण स्तंभ ही सत्य पर टिका है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

सत्य का महत्व:
सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। जब हम असत्य बोलते हैं या छल-कपट करते हैं, तो वास्तव में हम अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप से दूर चले जाते हैं। इसीलिए आचार्यों ने कहा है – सत्य व्रत सभी व्रतों का आधार है। असत्य, झूठ और कपट का सहारा लेकर व्यक्ति थोड़े समय के लिए सफल हो सकता है, लेकिन अंततः उसका पतन निश्चित है। जबकि सत्य का मार्ग कठिन और चुनौतीपूर्ण हो सकता है, परंतु उसका परिणाम सदैव शांति, विश्वास और स्थायी सुख के रूप में मिलता है।

वाणी और आचरण में सत्य:
सत्य केवल इतना नहीं है कि हम झूठ न बोलें। सत्य का अर्थ है – हमारी वाणी, विचार और आचरण तीनों में पारदर्शिता और शुद्धता हो। यदि मन में छल है, और वाणी में मधुर शब्द, तो वह सत्य नहीं है। यदि व्यवहार में कपट है और बाहर से सज्जनता, तो वह भी सत्य नहीं है। उत्तम सत्य का अर्थ है – अंदर और बाहर से एक समान होना।

सत्य और समाज:
समाज की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और विश्वास केवल सत्य से जन्म लेता है। आज यदि हम देखते हैं तो व्यापार से लेकर राजनीति और पारिवारिक संबंधों तक, हर जगह असत्य और धोखाधड़ी ने जगह बना ली है। इसी कारण आपसी विश्वास टूट रहा है, रिश्ते कमजोर हो रहे हैं और समाज अस्थिर होता जा रहा है। यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में सत्यनिष्ठ हो जाए, तो न केवल समाज में सौहार्द और विश्वास का वातावरण बनेगा, बल्कि हर क्षेत्र में पारदर्शिता और नैतिकता की स्थापना होगी।

सत्य और धर्म:
सत्य धर्म का मूल है। स्वयं तीर्थंकर भगवानों ने सत्य को अपने जीवन का आधार बनाया। उन्होंने कहा कि असत्य बोलना केवल दूसरों को धोखा देना नहीं है, बल्कि आत्मा की पवित्रता को कलुषित करना है। इसीलिए सत्य व्रत को इतना महत्व दिया गया है। सत्य के बिना अहिंसा भी अधूरी है, सत्य के बिना क्षमा भी अधूरी है, और सत्य के बिना धर्म भी अधूरा है।

सत्य और हमारी जिम्मेदारी:
आज हमें अपने जीवन में यह संकल्प लेना चाहिए कि हम किसी भी परिस्थिति में असत्य का सहारा नहीं लेंगे। चाहे व्यापार में हो या सामाजिक संबंधों में, चाहे परिवार में हो या किसी बड़े निर्णय में — सत्यनिष्ठा ही हमारी पहचान बने। हमें यह भी ध्यान रखना है कि सत्य बोलते समय वह कटु न हो, क्योंकि धर्म यह सिखाता है कि सत्य के साथ हितकारी और मधुर वाणी का संयोजन होना चाहिए। सत्य का उद्देश्य सुधारना है, आहत करना नहीं।

आज के दिन ‘उत्तम सत्य’ की साधना करते हुए हम सबको यह निश्चय करना होगा कि हम असत्य, छल और कपट से दूर रहेंगे, और अपने जीवन को इस प्रकार जिएंगे कि हमारा प्रत्येक व्यवहार, प्रत्येक निर्णय और प्रत्येक वचन आत्मा की पवित्रता को प्रतिबिंबित करे। यही दशलक्षण पर्व का संदेश है और यही जैन धर्म की आत्मा है।”

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने ‘उत्तम सत्य’ की साधना का सामूहिक संकल्प लिया।

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