नितिन जैन ने इस अवसर पर कहा कि आर्जव धर्म का सीधा अर्थ है सीधापन और निष्कपटता। जब मन, वचन और कर्म में कोई अंतर नहीं होता तब आत्मा पवित्र और निर्मल बनती है। उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग अक्सर एक बात सोचते हैं, दूसरी बोलते हैं और तीसरी करते हैं, यही कपट है। आर्जव धर्म हमें यह शिक्षा देता है कि जैसा सोचें वैसा ही बोलें और वैसा ही करें। इस धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति जीवन में सरलता और पारदर्शिता लेकर आता है। यही गुण आत्मा को हल्का और शांत बनाते हैं और समाज में आपसी विश्वास को मजबूत करते हैं।
मेघा जैन ने कहा कि आर्जव धर्म निष्कपट जीवन का प्रतीक है। जैसे निर्मल जल सबको शीतलता और ताजगी देता है, वैसे ही सरल और सच्चा जीवन समाज में शांति और सौहार्द स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि लोग अपने जीवन में मुखौटे लगाए रहते हैं, बाहर से कुछ और दिखते हैं और अंदर से कुछ और होते हैं। दशलक्षण पर्व हमें यह याद दिलाता है कि हमें इन मुखौटों को त्यागकर अपने असली स्वरूप में जीना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर हम बाहर और अंदर से एक समान होंगे तभी आत्मा का सच्चा कल्याण होगा और तभी मोक्षमार्ग की ओर प्रगति संभव है।
पूजन और प्रवचन के उपरांत सभी श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि वे अपने जीवन से छल, कपट, आडंबर और दंभ को दूर करेंगे और सरल, निष्कपट तथा सच्चा जीवन अपनाएंगे। श्रद्धालुओं ने कहा कि दशलक्षण पर्व केवल पूजन और अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन और आत्मशुद्धि का अवसर भी है। इस दिन के आयोजन ने सभी को अपने जीवन में आत्मनिरीक्षण करने और आर्जव धर्म को व्यवहार में लाने की प्रेरणा दी।
पूरे धाम परिसर में दिनभर भक्ति गीत, मंगलाचरण और स्तुतियों की गूंज बनी रही। श्रद्धालु जन बार-बार भगवान के दर्शन करने पहुंचे और धर्मलाभ प्राप्त किया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने इस पर्व को बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया। कई श्रद्धालुओं ने बताया कि यह दिन उनके लिए जीवनभर यादगार रहेगा क्योंकि उन्हें यहां केवल पूजा का नहीं बल्कि आत्मा को छू लेने वाला अनुभव प्राप्त हुआ।












