जैन संत उपाध्याय विहसंतसागरजी का आज भव्य नगर प्रवेश
कड़कड़ाती सर्दी में चल रहा है पद विहार
मुरैना (मनोज जैन नायक) जैन संत मेडिटेशन गुरु उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज का आज शाम को बड़े जैन मंदिर में भव्य मंगल आगमन होने जा रहा है ।
प्राप्त जानकारी के अनुसार समाधिस्थ गणाचार्य विरागसागर सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विश्वसाम्य सागर जी महाराज का मंगल पद विहार आगरा की ओर चल रहा है । ग्वालियर में पनिहार के निकट स्थित जैन तीर्थ जिनेश्वर धाम में भव्यतिभव्य जिन प्रतिमाओं का महामस्तकाभिषेक एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान कराने के पश्चात पूज्य गुरुदेव ने कड़कड़ाती भीषण सर्दी में आगरा की ओर पद विहार जारी रखा है ।
एबी रोड ग्वालियर हाइवे पर होगा आहार
आज की आहारचर्या प्रातः 10 बजे एबी रोड ग्वालियर हाइवे पर राकेश जैन टायर वालों के निज निवास पर होगी । सामायिक के पश्चात दोपहर 02 बजे श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर मुरैना के लिए मंगल पद विहार होगा ।
जैन समाज करेगा पूज्यश्री की भव्य अगवानी
जैन संत मेडिटेशन गुरु उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज के मंगल नगरागमन पर स्थानीय जैन समाज द्वारा भव्य आगवानी की जाएगी । सभीजन एबी रोड ग्वालियर हाइवे पर पहुंचकर पूज्यश्री मुनिराजों का पाद प्रक्षालन कर। आरती करते हुए उनके श्री चरणों में श्रीफल अर्पितकर अगवानी करेंगे ।
भव्य शोभायात्रा के साथ होगा नगर प्रवेश
नगर की सीमा बैरियर चौराहे से पूज्य जैन संतों को बैंड बाजों के साथ भव्य शोभा यात्रा के रूप में नगर के प्रमुख मार्गो से होते हुए बड़े जैन मंदिर में प्रवेश कराया जाएगा । विभिन्न स्थानों पर मुनिराजों का पाद प्रक्षालन एवं आरती करते हुए अगवानी की जाएगी । भव्य शोभायात्रा में जैन समाज का पुरुष वर्ग श्वेत वस्त्रों में एवं महिलाएं केसरिया परिधान में सम्मिलित होगी । युवा साथी हाथों में पचरंगीन ध्वजा को लहराते हुए चलायमान होगें । सभी लोग जैन भजन, जिनेन्द्र प्रभु की स्तुति एवं भगवान महावीर के संदेशों को उच्चारित कर अपनी खुशी का इजहार करेंगे ।
कड़कड़ाती सर्दी एवं कोहरे में पद विहार एक कठोर तप
कड़कड़ाती भीषण सर्दी एवं कोहरे में जैन संतों का पद विहार उनकी कठोर तपस्या और संयम का प्रतीक है, जहाँ वे बिना वस्त्र (दिगंबर संत) या अल्प वस्त्रों में, कड़ाके की ठंड में भी पैदल यात्रा करते हैं, क्योंकि सर्दी-गर्मी को वे ‘परिषह’ (कष्ट) मानकर सहन करते हैं । भक्तगण उनके पद विहार को सफल बनाने में सहयोग करते हैं, ताकि वे धर्म का संदेश जन-जन तक पहुंचा सकें। जैन संत सर्दी, गर्मी, बरसात जैसे सभी मौसमों में अपनी चर्या का पालन करते हैं, और शीतकाल को एक स्वाभाविक परिषह मानते हैं। जैन संत हमेशा पैदल चलते हैं और किसी भी भौतिक सुख-सुविधा का त्याग करते हैं, जिससे उनका मन और शरीर कठोर साधना के लिए तैयार होता है।
जैन संतों की इस तपस्या को देखकर लोग अचंभित होते हुए उन्हें वार बार नमन करते हैं।












