जैन धर्म की अमूल्य धरोहर के युग पुरुष स्व. निर्मल कुमार जी सेठी।
महावीर दीपचंद ठोले महामंत्री – श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा, महाराष्ट्र प्रांत छत्रपति संभाजीनगर। 7588044495
“एक जीवन, जो स्वयं धरोहर बन गया”
समाज के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व पद, प्रतिष्ठा या अधिकार से महान नहीं बनते, बल्कि अपने उद्देश्य, त्याग और दूरदृष्टि से युगनिर्माता बन जाते हैं। दिगंबर जैन समाज के ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे — स्वर्गीय निर्मल कुमार जी सेठी, जिन्होंने लगभग चार दशकों तक श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा का नेतृत्व करते हुए जैन तीर्थों, प्राचीन मंदिरों, पुरातात्त्विक धरोहरों और सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण का अद्वितीय अभियान चलाया। उनका जीवन मानो इस सत्य का सजीव प्रमाण था “संरक्षण ही संस्कृति का प्राण है,और संस्कृति ही समाज की आत्मा।”
27 अप्रैल 2021 को उनके देह परिवर्तन के पश्चात उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके पुण्य स्मरण दिवस को “जैन धरोहर दिवस” के रूप में मनाया जाना प्रारंभ हुआ।
यह केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि धरोहर संरक्षण के संकल्प का दिवस है।
“कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं,कुछ लोग इतिहास लिखते हैं;
पर विरले ही होते हैं वे जो स्वयं इतिहास बन जाते हैं।”यदि भविष्य मे जैन पुरातत्त्व के पुनर्जागरण का इतिहास लिखा जाएगा तो ऊसमे एक अध्याय निर्मल युग के नाम से स्वर्णाकित होगा।
प्रारंभिक जीवन
जैन संस्कृति के सशक्त आधार स्तंभ, मानवता के मसीहा स्व. निर्मल कुमार जी सेठी का जन्म 8 जुलाई 1938 को असम के तिनसुकिया नगर में धार्मिक , संस्कारित और सुसंपन्न पिताश्री स्व. हरकचंद जी सेठी के आंगन मे जन्म दात्री माता स्व सोहनी देवी की कोख से हुआथा।
उनके नाम की भाँति ही उनका व्यक्तित्व भी निर्मल ,विचार निर्मल,आचार निर्मल,कर्तृत्व निर्मल,दायित्व निर्मलथा।बाल्यकाल से ही उनमें धर्म, शास्त्र और गुरु परंपरा के प्रति गहन श्रद्धा थी।
उनके व्यक्तित्व में संगठन क्षमता, नेतृत्व कौशल और सांस्कृतिक चेतना स्वाभाविक रूप से विद्यमान थी।
उनकी आँखों में स्नेह का बहता झरना था और मुखमंडल पर सदैव सात्विक मंद मुस्कान शुशोभित रहती थी।“दिल में करुणा, नयन में शीतलता,वाणी में मधुरता का आलोक था।ऐसे व्यक्तित्व ही समाज के सत्य मार्गदर्शक बनते हैं।”
चालीस वर्षों का नेतृत्व : सामाजिक चेतना के अनुपम रत्न, परम दक्ष, परम योगी, मानवीय मूल्यों के परम संरक्षक, समता, समन्वय एवं आध्यात्म के शिखर पुरुष, विनम्र समाजसेवी, कर्मयोगी निर्मल कुमार जी सेठी ने
सन् 1981 में जब महासभा का अध्यक्षपद संभाला, तब जैन समाज की अनेक प्राचीन धरोहरें उपेक्षा का शिकार थीं।अनेक मंदिर जर्जर अवस्था में थे।प्राचीन प्रतिमाएँ असुरक्षित थीं।पुरातात्त्विक धरोहर बिखरी हुई थी।संगठनात्मक चेतना कमजोर थी।
स्व. सेठीजी ने महासभा को केवल प्रशासनिक संस्था नहीं रहने दिया, बल्कि उसे धरोहर संरक्षण के राष्ट्रीय आंदोलन का रूप प्रदान किया।ऊनका कहना था कि “छोटे मन से कोई बडा नही बन सकता और टुटे दिल से कोई खडा नही हो सकता।”वह कोई भी काम पुरी श्रृद्धा एवं लगन से करते थे।
उनके कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियाँ
650 से अधिक प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार और संरक्षण किया। पुरातत्त्व विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर जैन स्थलों को संरक्षित स्मारक का दर्जा दिलाने के प्रयास किया। लखनऊ, झांसी, सिरोल,मंडवारा,गोरखपुर, मथुरा ओडिसा आदी स्थानोमे जैन गैलरी और सांस्कृतिक दीर्घाओं की स्थापना की।जैन इतिहास के दस्तावेजीकरण और शोध कार्यों को संस्थागत स्वरूप दिया। भारत सरकार के सहयोग से पान्डु लिपि मिशन द्वारा प्राचीन ताडपत्रो के संग्रह का संवर्धन एवं प्रकाशन का अभूतपूर्व कार्य किया।
साप्ताहिक जैन गजट,प्राचीन तीर्थ जीर्णोद्धार,श्रुत संवर्धिनी,जैन महिला दर्श, आदी प्रत्र पत्रीका ओका प्रकाशन कर जैन धर्म का प्रचारप्रसार किया।महिला, युवा और क्षेत्रीयइकाइयों का संगठनात्मक विस्तार किया। 12000 से अधिक
विद्यार्थियों को शोध और शिक्षा हेतु छात्रवृत्तियाँ देकर ऊन्हे समर्थ बनाया।
इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक संस्थाओं की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।राजनैतिक चेतना मंच,महासभा चैरिटेबलट्रस्ट,निर्ग्रंथ सेंटरऑफआर्कियोलॉजी, ब्राम्ही सुंदरी संगीत कला केंद्र।इन संस्थाओं ने जैन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया और सिद्ध किया कि महासभा केवल नाममात्र की संस्था नही बल्की जैन समाज की सांस्कृतिक रीढ है।
जैन धरोहर संरक्षण :
निस्पृही,कर्मठ, निष्काम स्व. सेठी जी का स्पष्ट मत था “नया मंदिर निर्माण श्रद्धा है,परंतुप्राचीन मंदिरों का संरक्षण संस्कृति की साधना है।”उन्होंने जैन पुरातत्त्व को धर्मरक्षा काअनिवार्य अंग माना।उनके प्रयासों से अनेक प्राचीन प्रतिमाएँ सुरक्षित हुईं।उपेक्षित तीर्थों का पुनर्जीवन हुआ।
ऐतिहासिक अभिलेखों का संकलन प्रारंभ हुआ।उनकी दूरदृष्टि यह समझती थी कि यदि आज धरोहर नहीं बचाई गई, तो भविष्य की पीढ़ियाँ हमेंक्षमा नहींकरेंगी।
कहते है“जो विरासत को संभालते हैं, वही सभ्यता के रक्षक हैं,
वरना इतिहास की धूल में कितने साम्राज्य खो जाते हैं।”
धार्मिक जीवन और साधना
स्व. निर्मल कुमार जी सेठी केवल एक संगठनकर्ता नहीं, बल्कि अत्यंत धर्मनिष्ठ जिनभक्त थे।उनका दैनिक जीवन साधना से परिपूर्ण था।प्रतिदिन अभिषेकपूजन,स्वाध्याय,साधु-संतों की वैयावृत्ति,आहार दान ऊनकी दिन चर्या थी।उनकी साधु-संघ के प्रति अटूट श्रद्धा थी।
उन्होंने अपने जीवन की हर धड़कन को जिन धर्म की सेवा में समर्पितकरदिया।
राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय क्षितिज तक
विदेशो मे अंकित श्रमण संस्कृति एवं सभ्यता के महान अन्वेषक बाबुजी की दृष्टि केवल भारत तक सीमित नहीं थी।उन्होंने अमेरिका, यूरोप, एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों की यात्रा कर लगभग चालीस नगरों में जैन प्रतिमाओं और पुरावशेषों का अध्ययन कराया।
इन यात्राओं का उद्देश्य था विदेशों में संरक्षित जैन प्रतिमाओं का अध्ययन।जैन प्रभाव के ऐतिहासिक प्रमाणों की खोज।जैन संस्कृति को वैश्विक विमर्श में स्थापित करना।यह कार्य जैन धर्म के वैश्विक सांस्कृतिक अध्ययन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल थी।
व्यक्तित्व :
चार दशकों तक नेतृत्व करना केवल प्रशासनिक क्षमता नहीं, बल्कि धैर्य, संतुलन और समन्वय की साधना है। आशाओसे रहित,अभिलाषाओसे विरहित, आकांक्षाओंसे सुनियंत्रीत, समाज के सर्वांगीण सजग प्रहरी निर्मल जी सेठी संकीर्णताओं से ऊपर उठकर समाज की एकता और समरसता के पक्षधर थे। निर्णय एवं स्पष्ट और कार्य में दृढ़ थे। निजी जीवन में सादगी और अनुशासन के प्रतीक थे।व्यक्तिगत, पारिवारिक,विपत्तियां भीउनके संकल्प को डिगा न सकी। दो दो जवान बेटों की आकस्मिक मौत, धर्मपत्नी संतरादेवी के निधन के पश्चात भी निस्पृही भाव से अपने उद्देश्य से संलग्न रहे ।उन्होंने दुख को भी धर्म कार्य में रूपांतरित कर दिया था। वे ऐसे व्यक्ति थे जो काम हजार व्यक्ति मिलकर भी नहीं कर सकते वह काम बाबूजी ने अकेले कर दिखाया था। उनके व्यक्तित्व के बारे में कहा गया“The union of theorist, organizer and leader ship in one manis the rarest phenomenon on this earth.”
अर्थात एक ही व्यक्तिमें तत्वचिंतक, संगठनकर्ता और नेता का समन्वय अत्यंत दुर्लभ होता है।परंतु यह तीनों गुण स्व. सेठी जी में अद्भुत रूप से विद्यमान थे
ऐसे जैन धर्म के महानायक, महामानव, प्रेरणा पुन्ज,समाज ऊद्धारक जिन्होने
“पृथ्वी से धैर्य, आकाश से निर्मलता,सागर से गंभीरता, चंद्रमा से शीतलता ली है का देह परिवर्तन कोरोना काल मे 27 एप्रील 2021 को हो गया।ऊन्हे निश्चित ही ऊनके धर्म की आस्था का प्रतिफल श्रेष्ठ मनुष्य भव प्राप्त हुआ होगा।
पंचम “जैन धरोहर दिवस”:
27 अप्रैल को मनाया जाने वाला यह पांचवा “जैन धरोहर दिवस” केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि धरोहर संरक्षण का जनआंदोलन है।
यह हमें स्मरण कराता है हर तीर्थ हमारी जिम्मेदारी है।
हर प्राचीन प्रतिमा हमारी सांस्कृतिक पहचान है।हर जीर्ण मंदिर हमारे इतिहास का साक्षी है।आज उनके सु संस्कारीत, कर्मठ, निष्काम सुपुत्र धर्मेंद्र जी सेठी भी उनके पदचिह्नों पर चलकर जैन समाज के संगठन और उत्थान के लिए कार्य कर रहे हैं।
स्व. निर्मल कुमार जी सेठी अब केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं रहे —
वे जैन धरोहर संरक्षण की चेतना बन चुके हैं।आज आपका नश्वर शरीर हमारे बीच नही है परंतू आपकी सकारात्मक ऊर्जास्त्रोत हमारा हरपल मार्गदर्शन करते रहेगी।
उनका जीवन हमें प्रेरित करता है—
“कदम ऐसे चलो कि निशान बन जाए,
काम ऐसे करो कि पहचान बन जाए;
और जीवन ऐसा जियो किआने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन जाए।”
जैन समाज यदि जैन धरोहर दिवस को केवल आयोजन न बनाकर जन जागरण अभियान बना दे, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
श्री संपादक महोदय, यह आलेख जैन धरोहर निमित्त प्रकाशित कर उपकृत करे।धन्यवाद।
महावीर ठोले।












