जब तक तन मन इंद्रियों को जीव में मानता है तब तक संसार में दुःख मिलता है…..वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी………………………..
रिपोर्ट द्वारा अजीत कुमार कोठिया डडूका
.विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार मे समाधि तंत्र ग्रंथ की 61 से लगाकर 67 तक गाथाओं का रहस्य बताते हुए कहा कि जब तक तन मन इंद्रियों को जीव मै मानता है तब तक संसार में दुख मिलता रहता है। जब यह ज्ञान होगा कि मैं शरीर नहीं इंद्रियां नहीं सत्ता संपत्ति परिवार आदि नहीं तब मोक्ष होगा।
नए कपड़ों से जीव नया नहीं बन जाता फटे कपड़ों से फटा नहीं बन जाता लाल कपड़ों से लाल नहीं बन जाता गंदे कपड़ों से वह गंदा नहीं हो जाता। संपत्ति नष्ट होने से तुम नष्ट नहीं होते। शरीर को हष्टपुष्ट करने से आत्मा हष्टपुष्ट नहीं होता।
चोला कैसा भी पहनो इसका कोई महत्व नहीं है।
हमारा धर्म आध्यात्मिक है परंतु किसी भी पथ मत वाले इसकी आध्यात्मिकता को नहीं जानते।
जीव अनादि काल से क्रोध मान, माया लोभ से विवश होकर धर्म राजनीति व्यापार सब करता है।
गर्म पानी में दाल या चावल डालने पर ऊपर नीचे ऊपर नीचे होते हैं उसी प्रकार राग द्वेष ईर्षा आदि से जीव ऊपर नीचे ऊपर नीचे अनेक गतियां में भ्रमण करता है।
दिखावे ढोंग से धर्म होता है ऐसा मानना भी मुढता है। शरीर से ही धर्म होता है ऐसा मानना भी मुढता है। शरीर को कष्ट देने से मोक्ष मिलता तो नारकी पहले मोक्ष चले जाते।
आहार, भय, मैथुन, परिग्रह चारों संज्ञाओ से मोहित होकर जीव चारों गतियो में दुख सह रहा है।
आचार्य श्री यहां पर कहते हैं हे मुनिराज तू भाव से विशुद्ध होकर सभी प्रकार के तप कर। ख्याति पूजा लाभ प्रसिद्ध त्याग करके तप करो।
संसार में भ्रमण हो या मोक्ष हो सबका केंद्र बिंदु केवल आत्मा है।
धर्म विचार पूर्वक होता है.। भाव प्रथम तत्व है। भावपूर्वक ही आत्मा है। भाव का अभाव होगा नहीं। भाव यदि शुभ नहीं कर रहे तो अशुभ होंगे। चोर डाकू पशु पक्षी आदि मिथ्या दृष्टि अवस्था में अशुभ भाव तथा सम्यक दृष्टि अवस्था में शुभ भाव करते हैं।
छह द्रव्यों में केवल पुद्गल द्रव्य को ही विज्ञान आशिक जानता है।
जब तक जीव तत्व की भावना नहीं करता है तब तक रॉबर्ट मशीन की तरह है। भावना ही अमृत है। आत्म स्वरूप है। सुभाव ही मोक्ष, कुभाव ही पतन का कारण है। अनुप्रेक्षा तीर्थ यात्रा पूजा मूर्ति निर्माण मंदिर निर्माण कुछ भी करो परंतु भाव को शुभ रखो। भाव ही परम तत्व है। संपूर्ण पाप अशुभ भाव से, संपूर्ण पुण्य शुभ भाव से होता है इसके लिए ही धर्म है।
शुद्ध भाव पंचम काल में नहीं होते तो भी शुद्ध भाव की भावना भानी चाहिए। शुभभावना करने के लिए धन संपत्ति की कोई आवश्यकता नहीं तो भी शुभ भाव क्यों नहीं करते आचार्य श्री ऐसा कहते हैं।
पंचम काल में उत्तम संवहनन नहीं, उत्तम क्षेत्र नहीं श्रेणी आरोहण नहीं हो सकता अतः शुद्ध भाव नहीं हो सकते परंतु शुभभाव ही करने चाहिए। शुभ नहीं करने पर अशुभ भाव आएंगे। भाव को कोई बंदी नहीं बन सकता। भाव की शक्ति से नरक में स्थित श्रेणीक का जीव समता भाव से कष्ट सहन कर रहा है। परिणाम से ही बंध व मोक्ष होता है। पाप करने के कारण रावण कंस आदि भोजन करते समय भी भयभीत रहते थे उन्हें राम,कृष्ण दिखाई देते थे.।
मोह से बंधे जीव को साधु भी दुखी दिखाई देते हैं।
पावं हवई अशेषं, पुण्य अशेष हवई परीणाम।
परिणामादो बंध मोक्ख, जिनशासन दिण्ठ।
जिन वचन से विमुख रहने वाला जीव राग द्वैष, कषाओ से पाप ही बांधता है.। असंयमी अशुभ लेश्याओं से युक्त होने वाले अशुभ भाव पाप ही करते हैं।
शुभ भाव से भी दो प्रकार के कर्म बांधता है। अशुभ छोड़ेगा तो शुभ भाव करेगा। भाव शुद्धि के लिए बाह् निमित्त द्रव्य शुद्धि भी आवश्यक है।
पशु पक्षी भी अपने शरीर को घोसले को साफ रखते हैं। महलवासी ही नरकवासी है सफाई के लिए अनेक कर्मचारी रखने पड़ते हैं।
सुंदर लड़कियां अधिक सुंदर बनने के लिए सुंदर लड़कियों के खून से तथा शराब से स्नान करती थी ऐसी सुंदर विदेशी रानियां अनेक राजाओं को अपना दास बनाती थी।
स्व अशुभ भाव राग द्वैष मोह, कषाऐ आदि अशुभ कर्म को मारने से शुभ कर्म भी नष्ट हो जाते हैं जिससे अरिहंत बनते हैं। अरि अर्थात शत्रु हंत का अर्थ हनन करना कर्म शत्रु को नष्ट करने वाले अरिहंत होते हैं।
यहां पर आचार्य श्री कहते हैं हे मुनिराज 18 000 शील के दोषो व 84 लाख उत्तर गुणो का चिंतन करो। साधु जो उत्कृष्ट विचार चिंतन करते हैं वह राजा चक्रवर्ती भी नहीं कर सकते हैं। मरना स्वीकार करते हैं परंतु सूक्ष्म आध्यात्मिक चिंतन नहीं करते हैं। जैन धर्म की हर क्रिया में भाव का महत्व है।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित व्यंगात्मक कविता प्रस्तुत की।
होते महावीर यदि भारत में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती।
वर्धमान यदि वर्तमान में होते उन्हें पिछड़ा माना जाता। ये जानकारी सागवाड़ा निवासी
विजयलक्ष्मी गोदावत ने दी।
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