ग्रहस्थ जीवन त्याग कर संयम के मार्ग पर प्रशस्त हुई मनोरमा देवी अजमेरा

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ग्रहस्थ जीवन त्याग कर संयम के मार्ग पर प्रशस्त हुई मनोरमा देवी अजमेरा
– आचार्य वर्धमान सागर महाराज से दीक्षा लेकर बनी क्षुल्लिका वासुपूज्यमति माताजी
बंूदी, 17 फरवरी। छोटी काशी व धर्म नगरी के नाम से विश्व विख्यात बूंदी राॅयल सिटी देवपुरा निवासी मनोरमा देवी अजमेरा (72) सोमवार 16 फरवरी को ग्रहस्थ जीवन त्याग कर क्षुल्लिका वासुपूज्यमति माताजी बनकर संयम के मार्ग पर प्रशस्त हुई।
खण्डेलवाल सरावगी समाज संस्थान बूंदी के अध्यक्ष संतोष पाटनी ने जैन गजट को बताया कि राजस्थान की राजधानी जयपुर के निकट स्थित अतिशय क्षेत्र पदमपुरा मंे आयोजित भव्य धार्मिक कार्यक्रम में बूंदी निवासी मनोरमा देवी अजमेरा पत्नि श्री संपत कुमार अजमेरा वासुपूज्य भगवान के जन्म और तप कल्याणक दिवस पर आचार्य शांतिसागर महाराज के पंचम पट्टाचार्य वर्धमान सागर महाराज ने यह दीक्षा प्रदत्त की। अब उन्हें क्षुल्लिका 105 श्री वासुपूज्यमति माताजी के नाम से जाना जाएगा। अब उनके हाथों में पिच्छी और कमण्डल रहेगा।
प्राप्त जानकारी के अनुसार आचार्यश्री ने धर्मसभा में दीक्षा के महत्व को बताते हुए कहा कि इच्छाओं पर विजय पा जाना अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हुए अपनी समस्त इच्छाओं का दमन करते हुए धर्म की राह पर आगे बढ़ने का नाम ही दीक्षा है। जैनियांे की दीक्षा राग द्वेष निवृत्ति के लिए होती है। उनके परिवार के सदस्य मनीष अजमेरा ने बताया कि दीक्षार्थी ने आचार्यश्री से दीक्षा देने के लिए निवेदन किया।
इस अवसर पर आचार्य संघ गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी, गणिनी आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी के सानिध्य में आचार्यश्री के द्वारा दीक्षार्थी के पंचमुष्टि केश लोच किए गए तथा दीक्षा संस्कार किए गए।
पिच्छी और कमण्डल किए भेंट
आचार्य शांति सागर महाराज की परम्परा में आचार्य वर्धमान सागर महाराज ही ऐसे आचार्य हुए हैं जिन्होंने अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में दीक्षा दी है। आचार्य मुनि हितेन्द्र सागर एवं अन्य साधुओं व साध्वियों के सानिध्य में दीक्षार्थी के केश लोच किया। दीक्षा के बाद बंूदी निवासी संपत कुमार, मनीष अजमेरा परिवार द्वारा पिच्छी कमण्डल व शास्त्र भेंट किए गए। इस क्षुल्लिका दीक्षा की बूंदी जिले के साथ साथ पदमपुरा मंे उपस्थित सभी दिगम्बर जैन समाज ने अनुमोदना की है।
-रविन्द्र काला
जैन गजट संवाददाता, बूंदी

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