
दिव्य, मनोरम, दर्शनीय तीर्थक्षेत्र बड़ागांव
तीर्थराज द्रोणगिरि की पावन भूमि से लौटते समय मन अभी भी आध्यात्मिक शांति और श्रद्धा के भावों से सराबोर था। उसी पुण्य प्रवाह में सपरिवार श्री उदारसागर जनकल्याण तीर्थ बड़ागांव (धसान) के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह यात्रा आत्मा के भीतर उतरने वाली एक ऐसी अनुभूति थी, जिसने मन, चित्त और चेतना—तीनों को आलोकित कर दिया।
तीर्थ क्षेत्र में प्रवेश करते ही वहाँ की दिव्यता, शांति और सुव्यवस्थित व्यवस्था सहज ही मन को आकर्षित कर लेती है। प्रबंधकारिणी समिति के समर्पित पदाधिकारियों—श्री हुकुमचंद्र जी हटैया, पंडित श्री ऋषभ कुमार जी एवं युवा विद्वान पंडित सुनील जी प्रसन्न (शिक्षक), बड़ागांव—के साथ तीर्थ का विस्तृत अवलोकन करने का अवसर प्राप्त हुआ। उनके विचारों और भावी योजनाओं को सुनकर यह स्पष्ट अनुभूति हुई कि यह तीर्थ केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भविष्य की चेतना का सशक्त केंद्र भी बनने की ओर अग्रसर है।
रत्नमयी 1008 दर्शनीय प्रतिमाओं से सुसज्जित सहस्त्रकूट जिनालय इस तीर्थ का हृदय स्थल है। यह केवल एक स्थापत्य संरचना नहीं, बल्कि श्रद्धा, साधना और कलात्मक उत्कृष्टता का जीवंत उदाहरण है। प्रत्येक प्रतिमा मानो मौन होकर भी साधक से संवाद करती प्रतीत होती है। उन दिव्य रत्नमयी प्रतिमाओं के दर्शन मात्र से ही मन आनंद, शांति और संतोष से भर उठता है। यह अनुभूति शब्दों में बाँध पाना कठिन है, फिर भी मन बार-बार उसी दिव्य क्षण में लौट जाना चाहता है।
जिनालय की दूसरी मंज़िल पर स्थित 21 फुट अवगाहना की मुनिसुव्रतनाथ भगवान की भव्य प्रतिमा के दर्शन तो मानो आत्मा के गहनतम स्तर को स्पर्श कर गए। जैसे ही दृष्टि उस सौम्य और दिव्य प्रतिमा पर पड़ती है, श्रद्धा से शीश स्वतः झुक जाता है। प्रतिमा की भंगिमा, मुखमंडल की शांत आभा और सम्पूर्ण संरचना ऐसी है कि साधक अनायास ही ध्यानावस्थित हो जाता है। यह प्रतिमा केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव करने की साधना है।
हाल ही में नवंबर 2025 में आचार्य श्री उदार सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत रत्नमयी सहस्त्रकूट जिनालय एवं मुनिसुव्रतनाथ भगवान की प्रतिष्ठा संपन्न हुई। यह महोत्सव इस तीर्थ के आध्यात्मिक उत्कर्ष का एक ऐतिहासिक क्षण सिद्ध हुआ, जिसने सम्पूर्ण क्षेत्र को धर्ममय वातावरण से आलोकित कर दिया।
वर्ष 2013–14 में यहाँ संपन्न पंचकल्याणक महोत्सव की स्मृतियाँ आज भी मन में अंकित हैं। तब और अब के स्वरूप की तुलना करने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस तीर्थ का मानो कायाकल्प हो गया है। दिव्य, अकल्पनीय और अनुपम प्रतिमाएँ, निर्मल वातावरण तथा सुव्यवस्थित व्यवस्थाएँ देखकर मन गद्-गद् हो उठा। यह परिवर्तन केवल भौतिक विकास का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना के विस्तार का भी प्रतीक है।
आगामी समय में यहाँ विद्यालय संचालन की योजना इस तीर्थ की दूरदर्शिता को दर्शाती है। धर्म के साथ शिक्षा का यह समन्वय निश्चित ही समाज के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध होगा। विस्तृत प्रांगण, मुख्य सड़क के समीप स्थित होना तथा वर्तमान समिति की सक्रियता और समर्पण—ये सभी तथ्य इस तीर्थ को एक आदर्श धार्मिक एवं सामाजिक केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं।
यह पावन तीर्थ टीकमगढ़-बड़ागांव मार्ग पर बड़ागांव बस स्टैंड से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर, मुख्य सड़क के किनारे ही स्थित है, जिससे यहाँ पहुँचने में किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती।
सपरिवार जिनालय में श्रद्धा और विनय के साथ दर्शन कर स्वयं को अत्यंत धन्य अनुभव किया। इस अवसर पर श्री उदारसागर जनकल्याण तीर्थ एवं प्रबंधकारिणी समिति द्वारा किया गया आत्मीय बहुमान हृदय को स्पर्श कर गया और इस पावन यात्रा को और भी स्मरणीय बना गया।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि श्री उदारसागर जनकल्याण तीर्थ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि श्रद्धा, साधना, संस्कृति और सेवा का दिव्य संगम है। यहाँ के दर्शन आत्मा को शुद्ध करते हैं और जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं। प्रत्येक श्रद्धालु को जीवन में एक बार इस पुण्यभूमि के दर्शन अवश्य करने चाहिए—क्योंकि कुछ स्थान केवल देखे नहीं जाते, वे भीतर तक अनुभव किए जाते हैं।











