दसलक्षण (पर्यूषण पर्व) पर्व चौथा दिन -उत्तम शौच धर्म, 31 अगस्त पर विशेष :

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दसलक्षण (पर्यूषण पर्व) पर्व चौथा दिन -उत्तम शौच धर्म, 31 अगस्त पर विशेष :
उत्तम शौच : आत्मा की वास्तविक स्वच्छता
पर्यूषण पर्व जैन धर्म का आत्मिक महापर्व है। इसमें आत्मा को निर्मल बनाने हेतु दस धर्मों का साधन किया जाता है। इन दस धर्मों में आज का दिन “उत्तम शौच धर्म” के लिए समर्पित है। सामान्यतः शौच का अर्थ बाह्य स्वच्छता समझा जाता है, परंतु जैनदर्शन में शौच का अर्थ है – आत्मा की अंतःकरण से पवित्रता।
शौच का वास्तविक स्वरूप :
1. बाह्य शौच : शरीर, वस्त्र, आहार एवं परिवेश की स्वच्छता। स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक।
2. आभ्यंतर शौच : राग, द्वेष, मोह और लोभ से मुक्त होना। आत्मा को संयम, संतोष और साधना से निर्मल बनाना। यही वास्तविक शौच है।
शौच और जैन दर्शन : जैनाचार्यों ने बाह्य शुचिता से अधिक आंतरिक शुचिता पर बल दिया है। बाह्य स्वच्छता क्षणिक है, किंतु आंतरिक शुद्धता आत्मा के उत्थान का मार्ग है। आचार्य कहते हैं –
“बाह्य शुचिता शरीर को स्वस्थ करती है,
किंतु अंतरंग शुचिता आत्मा को मुक्त करती है।”
शौच धर्म का आचरण
1. संतोष – अपनी परिस्थिति में प्रसन्न रहना। 2. आत्मनिरीक्षण – दोषों को पहचानकर उनका परिमार्जन करना। 3. लोभ का त्याग – धन, वस्त्र, आभूषण व इन्द्रिय-सुख में आसक्ति न रखना। 4. ध्यान व स्वाध्याय – आत्मा के शुद्ध स्वरूप का चिंतन।
दूसरे का वैभव, ऐश्वर्य, यश, ज्ञान, पुण्य का उदय, प्रभाव, स्त्री, संतान, धन, संपत्ति इत्यादि देख कर कभी ईर्ष्या नहीं रखना, अपनी अत्यन्त ही दुर्लभ इस मनुष्य पर्याय में जो है जितना है उसी में संतोष कर अशुभ भावों का अभाव करके आत्मा कि शुचि को करो।
यह भी सहज ही है कि जो लालची होगा वह अपनी विषय पूर्ति के लिए समय आने पर चोरी, मायाचारी, छल-कपट, हिंसा, परिग्रह, बैर-भाव भी करता ही रहेगा । उत्तम शौच धर्म हमें यही सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला है, उसी में खुश रहो। परमात्मा का हमेशा शुक्रिया मानों और अपनी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करना मुमकिन है।
मनुष्य में लोभ ही समस्त पापों की जड़ है, जिसके वशीभूत होकर मानव पाप-अपराध करते हैं। लोभ सबसे बड़ा शत्रु है। लोभ के कारण ही भाई, भाई का शत्रु और पुत्र, पिता का शत्रु बना है। समाज में व्याप्त हिंसा, अनाचार, भ्रष्टाचार, चोरी, अपहरण हत्या, अपराध सब लोभ के कारण ही होता है। जिसमें लोभ की प्रवृत्ति रहेगी, उसमें शुचिता-पवित्रता संभव ही नहीं। इन मलिन विकारों पर विजय प्राप्त करने के लिए निर्मलता, समता भाव का होना अति आवश्यक है। जो संतोष रूपी जल से लोभ रूपी मल को धोता है, उसे निर्मल शौच धर्म होता है, शौच-धर्म को धारण करने के लिए मनुष्य को पंचेन्द्रिय विषयों में आसक्ति, धन संबंधी सामग्री को संचित करने की प्रवृत्ति का त्याग करना आवश्यक है।
शौचधर्म का प्रयोजन तो “आत्मा को” पवित्र करने से होता है, इसका इस देह से कोई सम्बन्ध नहीं मानना। अनादिकाल से यह आत्मा लोभ रूपी मल से मलिन हो रखा है उसे पवित्र करना तथा करने का भाव आना ही शौचधर्म है।
भौतिक संसाधनों और धन दौलत में खुशी खोजना यह महज आत्मा का एक भ्रम है। उत्तम शौच धर्म हमे यही सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला है उसी में खुश रहो।लोभ छोड़ने से ही आत्मा में उत्तम शौच धर्म प्रकट होता है। अनादि काल से यह आत्मा लोभ रूपी मल से मलिन हो रखा है उसे पवित्र करना तथा करने का भाव आना ही शौचधर्म है।
हम जानते ही हैं की लालची जीव किसी भी अवस्था में संतुष्टि को प्राप्त नहीं होता वह तो सदैव ही असंतुष्ट रहता है, और असंतुष्ट जीव की आशाएं,अपेक्षाएं और संसार कभी ख़त्म नहीं हो सकते।
आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में जहां इंसान को चार पल की फुर्सत अपने घर-परिवार के लिए नहीं है, वहां खुद के निकट पहुंचने के लिए तो पल-दो पल भी मिलना मुश्किल है। इस मुश्किल को आसान और मुमकिन बनाने के लिए जब यह पर्व आता है, तब समूचा वातावरण ही तपोमय हो जाता है।
आधुनिक संदर्भ में शौच धर्म : आज का युग उपभोगवाद और भौतिकता का है। मनुष्य बाहर से स्वच्छ दिखता है पर अंदर ईर्ष्या, लोभ और असंतोष छिपा होता है। उत्तम शौच धर्म हमें याद दिलाता है कि –स्वच्छता केवल शरीर या पर्यावरण की नहीं, बल्कि अंतःकरण की होनी चाहिए। जब मन शुद्ध होगा तभी समाज और वातावरण भी शुद्ध होंगे।
उत्तम शौच धर्म हमें आत्मा की स्वाभाविक पवित्रता का बोध कराता है। जब बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार की शुचिता जीवन में उतरती है, तब मनुष्य का जीवन धर्ममय, सुखमय और मुक्ति-पथगामी बनता है।  “बाह्य शुचिता स्वास्थ्य देती है,
पर अंतरंग शुचिता मुक्ति का मार्ग खोलती है।”
कविवर द्यानतराय जी दसलक्षण धर्म की  पूजन में लिखते हैं-
धरी हिरिदे संतोष, करहु तपस्या देह सों ।
शौच सदा निरदोष, धरम बड़ो संसार में ।।
-डॉ सुनील जैन संचय ललितपुर
मोबाइल, 9793821108

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