दान करने से उभय लोक में यथेष्ट सफलता प्राप्त होती है – अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज
औरंगाबाद
राष्ट्र गौरव आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ने विज्ञा तीर्थ गुन्सी में मंगल प्रवेश किया
आज हुआ निवाई शहर में गाजे बाजे से मंगल पदार्पण
निवाई गुन्सी –
सकल दिगम्बर जैन समाज भारत के तत्वावधान में बुधवार को सहस्त्र कूट जिनालय विज्ञा तीर्थ गुन्सी में मंगल प्रवेश किया। अखिल भारतीय जैन धर्म प्रचारक विमल पाटनी एवं हितेश छाबड़ा ने बताया कि आचार्य प्रसन्न सागर महाराज संध सहित बुधवार को विज्ञा तीर्थ गुन्सी पहुंचे जहां विज्ञा तीर्थ कमेटी कार्याध्यक्ष सुनील भाणजा, नवरत्न टोंग्या, महावीर प्रसाद पराणा, गोपाल कठमाणा, अमित कटारिया, विमल पाटनी, इन्दू मित्तल, कमलेश झिलाय, लालचंद कठमाणा, अनिल बनेठा, जैन सोशल ग्रुप के हितेश छाबड़ा, राजस्थान जैन सभा उपाध्यक्ष चेतन निमोडि़या, अनोखी पत्रिका के सम्पादक मनीष बैद, विष्णु बोहरा, महेंद्र चंवरिया, अमित सिरस, यश संधी, चिराग टोंग्या, अक्षय पांडया, चन्द्रेश जैन, मुकेश बनेठा, त्रिलोक रजवास, अशोक भाणजा, महेश मोठूका, नेमीचंद सिरस, अनिल भाणजा, रवि भाणजा, सहित अनेक लोगों ने आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज का पाद् प्रक्षालन कर अगुवानी की एवं चाकसू कोथून से विज्ञा तीर्थ पर विहार करवाया। विमल जौंला एवं राकेश संधी ने बताया कि सांयकाल विज्ञा तीर्थ पर आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज संध ने स्वाध्याय प्रतिक्रमण करते हुऐ सामायिक किया। आचार्य श्री के मंगल विहार में जिनोदय युवा संघ, जयपुर, चाकसू, निवाई, टोंक, पदमपुरा कमेटी एवं राजस्थान जैन सभा, जैन सोशल ग्रुप निवाई, एवं महिला मण्डल निवाई के श्रद्धालुओं ने विहार में पुण्य लाभ लिया। इस अवसर पर आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को कहा कि संसार में अनेक विचार धाराओं के मनुष्य होते हैं कुछ तो ऐसे होते हैं जो दान देने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। अवसर की खोज करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि दया करुणा भक्ति एवं प्रेम के साथ अपने पास जो कुछ है उसमें से कुछ दूसरों के लिए दे देने को दान कहते हैं अथवा किसी को कोई वस्तु समर्पित करने को दान कहते हैं। दान देने वाला दाता कहलाता है और दान लेने वाला पात्र कहा जाता है। आचार्य श्री ने कहा कि दान को आगम की दृष्टि से चार भागों में विभाजित किया गया है ज्ञान दान, आहार दान, औषधि दान, और अभय दान। इसके अतिरिक्त दीन दुखी प्राणियों को करुणा भाव से उनकी आवश्यकता की पूर्ति के साधन प्रदान करना करुणा दान है। लोक व्यवहार में रक्तदान, नेत्रदान, कन्यादान आदि अनेक दोनों की परम्परा है। उन्होंने कहा कि दान की महिमा अपरम्पार है। जो दान देते हैं वह लोक में ख्याति, यश, पूजा प्रतिष्ठा, धन वैभव के साथ समस्त कर्मों को विनष्ट कर केवल्य लक्ष्मी को प्राप्त कर लेते हैं। मुक्ति सुख को वरण कर लेते हैं। संसार में तरण तारण बन जाते हैं अतः प्रत्येक मनुष्य का नैमित्तिक एवं नैतिक सर्वोपरि कर्तव्य है दान स्वरूप में पात्रता को देखकर समर्पित करना ही चाहिए तभी उभय लोक में यथेष्ट सफलता प्राप्त होगी।
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद












