सीआईसीटी में डॉ. धींग ने डॉ. गोविंदराजन का सम्मान किया

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सीआईसीटी में डॉ. धींग ने डॉ. गोविंदराजन का सम्मान किया
चेन्नई।
अणुव्रत समिति और तमिलनाडु हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष साहित्यकार डॉ. दिलीप धींग ने 17 फरवरी, मंगलवार को पेरुम्बाक्कम स्थित केन्द्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान (सीआईसीटी) में तमिल-हिंदी विद्वान डॉ. एम. गोविंदराजन का शॉल, मुक्ताहार, साहित्य और कलम से सम्मान किया और उनका आशीर्वाद लिया। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान सीआईसीटी में भाषा विशेषज्ञ के रूप में सेवारत 83 वर्षीय गोविंदराजन ने कहा कि तमिल भाषा और साहित्य के विकास में जैनों का ऐतिहासिक योगदान है। किसी समय उनकी इच्छा थी कि वे तमिल साहित्य के विकास में जैनों के योगदान पर पीएच.डी करे, पर उनके प्राध्यापक ने मना कर दिया।
प्राचीन तमिल साहित्य के हिंदी अनुवाद के परियोजना समन्वयक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गोविंदराजन ने कहा कि अनुवाद आसान कार्य नहीं है। डॉ. धींग ने कहा कि तमिल की तरह प्राकृत भी प्राचीन भाषा है। दोनों का आगमकालीन संबंध है। 2024 में सरकार ने प्राकृत को भी शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया है। प्राचीन तमिल कवि प्राकृत और संस्कृत के भी जानकार होते थे। वर्तमान में अनुवादक भी यदि तीनों भाषाओं के साथ यदि प्राकृत साहित्य के मुख्य विषयों के जानकार भी हो तो अनुवाद अधिक समृद्ध हो सकता है।
राष्ट्रपति से सम्मानित गोविंदराजन ने डॉ. एस. बालुसामी की पुस्तक ‘तमिलनाडु में जैन चित्रावली और संस्थान की गतिविधियाँ बताईं। एक प्रश्न के उत्तर में डॉ. धींग ने कहा कि राजस्थानी भी एक समृद्ध भाषा है और इसका भी गौरवशाली इतिहास है। सीआईसीटी स्टाफ सदस्यों ने डॉ. धींग की हिंदी में अगवानी की, इस पर गोविंदराजन ने बताया कि वे यहाँ प्रतिदिन हिंदी पढ़ाते हैं। स्टाफ सदस्य स्वेच्छा और रुचि से हिंदी सीख रहे हैं। वेंकटेशन ने धन्यवाद दिया।
संलग्न फोटो- गोविंदराजन का सम्मान करते डॉ. धींग

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