मध्यप्रदेश के धार भोजशाला से दो प्रतिमाएँ ब्रिटिस संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। पिछले आलेख ‘‘भोजशाला: अम्बिका-वाग्देवी की प्रतिमा और अभिलेख’’ में हमने उस प्रतिमा के पादपीठ पर उत्कीर्णित अभिलेख के पाठ को एक-एक अक्षर का सप्रमाण वाचन कर दिखाया था, जिसे लोग हिन्दू वाग्देवी प्रतिमा कह रहे हैं उसके पादपीठ पर अभिलेख इस प्रकार है- ‘‘ओं।। श्रीमद्भोजनरेंद्रचंद्रनगरी विद्याधरी धर्म्मधी यो …. नामस्मरणं …… खलु सुखप्रस्थापनं। या धाराः वाग्देवी प्रथम विधायजननी, पश्चाज्जिनानात्रयीमम्बा.. नित्यफलाधिकां वररुचिः मूर्तिं सुभा नि र्म्ममे।। इति सुभंमस्तु सुत्रधार सहिस्सुतमणथलेण घटितं।। विज्ञानिक सिवदेवेन लिखितमिति।
संवत् 1091 ।।’’। प्राकृत के प्रथम व्याकरण ग्रन्थ ’’प्राकृत-प्रकाश’’ के लेखक जैनाचार्य वररुचि ने वह प्रतिमा बनवाई थी, उसमें उल्लेख है कि श्रीमद्भोजनरेन्द्रचंद्र की नगरी धारा में सर्व प्रथम विद्या की जननी वाग्देवी की प्रतिमा बनवाई, उपरान्त तीन तीर्थंकरों और इस अधिक आम्रफल वाली (अधिक सुफल) देने वाली अम्बिका प्रतिमा को निर्मित कराया। इस अभिलेख में संवत् 1091 दिया है। प्राचीन लिपि की सही जानकारी न होने के कारण या अन्य किसी कारणवश कुछ लोगों ने इसका पाठ वाचन ठीक नहीं किया है, यहांतक कि धार के किला स्थित राजकीय संग्रहालय में भी इस अभिलेख का गलत पाठ प्रदर्शित किया गया है।
प्रचारित हिन्दू वाग्देवी जैन सरस्वती है-
ब्रिटिश संग्रहालय में धार भोजशाला की जो दो प्रतिमाएं हैं, उन्हें भारत को लौटाने की मांग भी की गई है। उनमें दूसरी वह जैन सरस्वती वाग्देवी प्रतिमा है जिसका उल्लेख अम्बिका मूर्ति के अभिलेख में किया गया है। उसमें जैन सरस्वती के पूर्ण लक्षणों के साथ शिल्पन है, जिनके कारण कोई उसे झुठला नहीं सकता। भारत में सर्वप्राचीन 132 ईस्वी की सरस्वती प्रतिमा जिन सरस्वती है जो मथुरा के कंकाली टीला से उत्खनन में प्राप्त हुई थी, इसके पादपीठ पर ब्राह्मी लिपि में अभिलेख है जिससे इसकी पहचान हुई। इसका सिर खण्डित है, बायें हाथ में लंबे पत्रों (ताड़पत्र) वाला ग्रन्थ है, दाहिने हाथ में माला का अवशिष्ट भाग दृष्ट है। जैन सरस्वती और शासनदेव-देवी की स्वतंत्र प्रतिमाओं में के वितान भाग में बहुधा एक या एकाधिक लघु तीर्थंकर प्रतिमा शिल्पित रहती है, किन्तु इस तरह का शिल्पन सभी पर अनिवार्य रूप से नहीं रहता।
सरस्वती प्रतिमा-
ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित यह मूर्ति श्वेत संगमरमर में निर्मित है, यह त्रिभंगासन में खड़ी है। यह चतुर्भुज चारों अनुयोग की प्रतीक है। दोनों दायें हाथ भग्न हैं। पैरों में पाजेब व पैजनियां, कटि में मुक्तमेखला कटिबंध, झालरों और सलवटों युक्त अधोवस्त्र, भुजाओं में बाजुबंध, कलाईयों में कड़े, गले में लटकते मुक्ताहार, कुचबंध, कर्णाभरण, मुकुट आदि आभूषणों से भूषित है। बायें हाथ में लंबे पत्रों (ताड़पत्र) वाला ग्रन्थ है, वह लम्बे और पतले पत्रों वाला होने से मुड़ा हुआ दर्शाया गया है। परिकर में पादपीठ पर चरणों के निकट दोनों ओर आगे को आराधक या मूर्ति निर्माण करवाने वाले पति-पत्नी अंजलिवद्ध बैठे हैं, दोनों ओर चॅवर ढुराती हुईं सेविकाएं हैं, उनके वाह्य भाग में सर्वभूषण भूषित एक-एक देवी अतिरिक्त शिल्पित है। दोनों किनारों पर एक-एक मानस्तंभ जैसा स्तंभ है। उनसे ऊपर सरस्वती के कटिभाग के समानान्तर एक-एक पद्मासन लघु तीर्थंकर शिल्पित हैं, उनसे ऊपर भी सरस्वती के स्कंधों के समानान्तर एक-एक पद्मासन लघु तीर्थंकर शिल्पित हैं, इनकी देवकुलिका भी है। देवी के मस्तक-मुकुट के ऊपर भी इसी तरह की देवकुलिका में लघु तीर्थंकर प्रतिमा है। उसके दोनों ओर सम्भवतः चामरधारी और पुष्पवर्षक माल्यधारी देव शिल्पित हैं।
ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित उक्त प्रतिमा के नीचे उसकी पंजीयन संख्या के साथ अंग्रेजी में परिचय लिखा है, जिसका आशय इस प्रकार है-‘‘सरस्वती, मध्य भारत, मालवा, 11वीं शताब्दी ईस्वी का आरम्भिक काल, पुस्तक हाथ में लिए ज्ञान की देवी की यह संगमरमर की मूर्ति पाँच तीर्थंकरों से घिरी हुई दिखाई देती है। जैन धर्म में देवी विशेष रूप से लोकप्रिय है, जिसका कारण शायद जैन परंपरा में पांडुलिपि निर्माण और पुस्तकालयों के रखरखाव को दिया जाने वाला महत्व है।’’ (यह चित्र हमें श्री निर्मलकुमार पाटौदी ने उपलब्ध कराया है।)
समीक्षा-
1. इस प्रतिमा के परिकर और वितान में पांच लघु जिन तीर्थंकर प्रतिमाएं हैं। देव-देवी के परिकर या वितान में एक या एकाधिक तीर्थंकर तीर्थंकर प्रतिमा केवल जैन शासन देव-देवियों में ही शिल्पन की परम्परा और विधान है, अतः यह जिन सरस्वती ही है।
2. जैन शासन देव-देवियों के अतिरिक्त अन्य किसी देव-देवी के परिकर या वितान में जिन प्रतिमा के शिल्पन की परम्परा नहीं है, न ही अबतक की प्राप्त किसी प्रतिमा में ऐसा कोई उदाहरण है।
3. ब्रिटिश संग्रहालय में इस प्रतिमा का परिचय पट्टिका में जैन सरस्वती के रूप में ही दिया गया है, जो वास्तविक है।
4. एक पक्ष केवल उस अम्बिका प्रतिमा को ही वाग्देवी के रूप में प्रचाारित कर रहा है, जिसका परिचय हमने अलग आलेख ‘‘भोजशाला: अम्बिका-वाग्देवी की प्रतिमा और अभिलेख’’ में दिया है।
5. धार भोजशाला से प्राप्त अम्बिका प्रतिमा की प्रशस्ति में जो वाग्देवी का उल्लेख है वह यही जिन सरस्वती है। उसी प्रशस्ति में तीन जिनों की प्रतिमाएं तथा अम्बिका देवी की प्रतिमाओं उल्लेख है, तो अम्बिका तो वह प्रशस्ति युक्त है ही, अभी विगत वर्ष हुए सर्वेक्षण में तीर्थंकर प्रतिमाएं प्राप्त होने के समाचार आये थे, जिनसे उक्त प्रशस्ति में हुए उल्लेख की पांचों जैन परम्परा की प्रतिमाओं की उपलब्धता सिद्ध हो जाती है।
6. हिन्दू सरस्वती की भारत में अब तक प्राप्त प्रतिमाओं से उक्त वाग्देवी प्रतिमा का साम्य नहीं है।
7. प्रस्तुत वाग्देवी का शिल्पनजैन प्रतिष्ठापाठों, कल्पों, जैन शिल्पशास्त्रों, सरस्वती स्तोत्रों आदि में वर्णित जिन सरस्वती के लक्षणों व विधान के अनुसार इस प्रकार है-
पं. बालचन्द्र जी ने जैन प्रतिमा विज्ञान में श्रुतदेवता सरस्वती के परिचय में लिखा है कि ‘तिलोयपण्णत्ती’ में अनेक स्थलों पर श्रुतदेवी (सरस्वती) के रूप (प्रतिमाओं) का उल्लेख मिलता है। मथुरा के जैन शिल्प में प्राचीनतम सरस्वती प्रतिमा प्राप्त हुई है जो लेखयुक्त है। बीकानेर तथा अन्य कई स्थानों की जिन सरस्वती प्रतिमाएँ सुप्रसिद्ध हैं। श्रुतदेवता या सरस्वती की प्रतिमाओं के निर्माण और उनकी पूजा की परम्परा जैनों में अति प्राचीन काल से चली आ रही है। सरस्वती द्वादशांग श्रुतदेव की अधिदेवता है। भगवान् जिनेन्द्र के वस्तुतत्त्वनिरूपण को उनके गणधरों ने बारह अंगों में संग्रहीत किया था जिसे द्वादशांग आगम या श्रुत कहा जाता है। जिनेन्द्र की वाणी होने के कारण श्रुत जिनेन्द्र के समकक्ष प्रामाणिक और पूज्य माना जाता है। इसलिये श्रुत को भी देव की संज्ञा प्राप्त हो गयी। कालान्तर में श्रुत की अधिदेवता के रूप में श्रुतदेवता या सरस्वती के मूर्त रूप की कल्पना हुयी। सरस्वती को भारती, वारणी आदि अनेक नामों से स्मरण किया जाता है।
मल्लिषेण ने अपने भारतीकल्प में सरस्वती वन्दना करते हुये लिखा है कि हे देवि, सांख्य, चार्वाक, मीमांसक, सौगत तथा अन्य मत-मतान्तरों को मानने वाले भी ज्ञानप्राप्ति के हेतु तेरा ध्यान करते हैं। सरस्वती को जटाभालेन्दु-मण्डिता कहा है। वर्ण श्वेत होता है और वह सरोजविष्टर पर आसीन होती है। सरस्वती के चार हाथों में से एक हाथ अभय मुद्रा में होता है और दूसरा हाथ ज्ञानमुद्रा में। शेष दो हाथों के आयुध क्रमशः अक्षमाला और पुस्तक हैं। सरस्वती की स्तुति में अनेक जैन आचायों और पंडितों ने कल्प, स्तोत्र और स्तवन रचे हैं। बप्पभट्टि का सरस्वतीकल्प, साध्वी शिवार्या का पठितसिद्धसारस्वतस्तव, जिनप्रभसूरि का शारदास्तवन और विजयकीर्ति के शिष्य मलयकीर्ति का सरस्वतीकल्प कुछेक प्रसिद्ध रचनाओं में से हैं। मलयकीर्ति ने सरस्वती को कलापिगमना और पुण्डरीकासना बताया है। उन्होंने भी सरस्वती को चतुर्भुजा कहा है। आचारदिनकर में श्रुतदेवता को श्वेतवर्ण, श्वेतवस्त्रधारिणी, हंसवाहना, श्वेतसिंहासनासीना, भामण्डलालंकृता और चतुर्भुजा बताया गया है। देवी के वायें हाथों में श्वेतकमल और बीणा तथा दायें हाथों में पुस्तक और मुक्ताक्षमाला का विधान किया गया है किन्तु आचारदिनकर के ही सरस्वती स्तोत्र में देवी के बायें हाथों के आयुध बीणा और पुस्तक तथा दायें हाथों के आयुध माला और कमल कहे गये हैं। निर्वाणकलिका में भी सरस्वती के रूप का वर्णन मिलता है। इस ग्रन्थ के बिम्बप्रतिष्ठाविधि स्थल में सरस्वती को द्वादशांग श्रुतदेव की अधिदेवता कहा गया है। निर्वाणकलिका के अनुसार श्रुतदेवता के दायें हाथों में से एक हाथ वरद मुद्रा में होता है और दूसरे हाथ में कमल होता है। बायें हाथों के आयुध पुस्तक प्रौर अक्षमाला बताये गये हैं।
मल्लिषेणाचार्य का सरस्वती मंत्र कल्प, पूज्यपादकृत शारदा स्तोत्रम्, ज्ञानभूषण मुनि का सरस्वतीस्तोत्रम् है। अज्ञात रचनाकारों की- सरस्वती देवी स्तोत्र, श्री सरस्वतीस्तोत्रम्, अष्टोत्तरशतनाम-शारदास्तोत्रम् आदि जिन सरस्वती पर लगलग बीस महत्वपूर्ण कृतियां हैं कृतियां हैं।
सोलह विद्यादेवियां-
लाडनूं, राजस्थान के श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में अभ्लििखित जिन सरस्वती प्रतिमा के निकट सोलह जिन विद्यादेवियों का शिलाफलक भी स्थापित है। अभिधानचिंतामणि में सोलह विद्यादेवियों के नाम इस प्रकार हैं- वाक्, ब्राह्मी, भारती, गौ, गी, वाणी, भाषा, सरस्वती, श्रुतदेवी, वचन, व्यावहार, भाषित और वचस भी कहा गया है। आचार्य बप्पभट्ट सूरिकृत चतुर्विंशतिका के अनुसार सोलह विद्यादेवियों के नाम इस प्रकार हैं- रोहिणी, प्रज्ञप्ति, वज्रश्रृंखला, जाम्बूनदा, काली, महाकाली, गौरी, गांधारी, ज्वालामालिनी, मानवी, वैरोटी, अच्युता, मानसी और महामानसी। किन्तु इनमें से कुछ को जिनशासन की चतुर्विंशति शासन देवी या यक्षिणियों में भी परिगणित किया गया है।
22/2, रामगंज, जिंसी, इन्दौर















