भीतर के महावीर को जगाने का आह्वान
जैन परंपरा के चिरंतन इतिहास में तीर्थंकरों की परंपरा केवल धार्मिक श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि मानवता के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान की दिशा में एक महान मार्गदर्शक रही है। इस गौरवशाली परंपरा के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्मकल्याणक केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मजागरण का प्रेरक अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य का वास्तविक उत्कर्ष बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आत्मविजय से होता है।
भगवान महावीर का जीवन इस सत्य का उज्ज्वल उदाहरण है कि महावीरता बाहरी पराक्रम में नहीं, बल्कि अंतःकरण की विजय में निहित है। राजवैभव में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने जीवन का लक्ष्य सांसारिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान और आत्ममुक्ति में खोजा। तीस वर्षों तक राजमहल में रहते हुए भी उनके अंतर्मन में वैराग्य की चेतना प्रबल रही और अंततः उन्होंने त्याग, तप और साधना का मार्ग अपनाया। बारह वर्षों की कठिन साधना के पश्चात उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और उसके बाद उन्होंने मानवता को धर्म, करुणा और आत्मसंयम का मार्ग दिखाया।
महावीर का धर्म किसी संकीर्ण परिधि में बंधा हुआ नहीं है। उनका संदेश सार्वकालिक और सार्वभौमिक है। उन्होंने धर्म को कर्मकांड या बाहरी प्रदर्शन का विषय नहीं माना, बल्कि उसे जीवन के आचरण में उतारने का आग्रह किया। समता, सत्य, ईमानदारी, पवित्रता, अपरिग्रह, अनेकांत और अहिंसा—ये वे मूल्य हैं जो महावीर के धर्म की आधारशिला हैं। यदि धर्म मनुष्य के भीतर इन मूल्यों को जागृत नहीं करता, तो वह केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।
आज का युग तीव्र प्रतिस्पर्धा, हिंसा, स्वार्थ और वर्चस्व की मानसिकता से ग्रस्त दिखाई देता है। जीवन की दौड़ में मनुष्य बाहरी सफलता के पीछे भागते हुए अपने भीतर की शांति और संतुलन खोता जा रहा है। ऐसे समय में महावीर का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जो मनुष्य स्वयं को जीत लेता है, वही सच्चा विजेता है। इंद्रियों पर नियंत्रण, इच्छाओं का संयम और अहंकार का त्याग—यही वास्तविक महावीरता है।
दुर्भाग्य से आज धर्म का स्वरूप भी अनेक स्थानों पर बाहरी आडंबरों में सीमित होता जा रहा है। मंच, माला और माइक की चमक-दमक में कभी-कभी धर्म का वास्तविक उद्देश्य धुंधला पड़ जाता है। राजनीति, शिक्षा, न्याय और स्वास्थ्य जैसे पवित्र क्षेत्रों में भी नैतिक मूल्यों का ह्रास चिंता का विषय बनता जा रहा है। ऐसे समय में भगवान महावीर का जीवन और उनकी शिक्षाएँ समाज के लिए दीपस्तंभ के समान मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि किसी भी स्थायी परिवर्तन की शुरुआत भीतर से होती है।
महावीर बनने का मूल सूत्र है—अहंकार का विसर्जन। ‘मैं’ की दीवार जब तक बनी रहती है, तब तक प्रेम, करुणा और सहअस्तित्व की भावना विकसित नहीं हो सकती। महावीर का संदेश हमें यही सिखाता है कि विनम्रता, सहनशीलता और आत्मसंयम ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। जब मनुष्य अपने भीतर की दुर्बलताओं को पहचानकर उन्हें जीतने का प्रयास करता है, तभी वह वास्तविक प्रगति की ओर अग्रसर होता है।
महावीर जयंती का वास्तविक अर्थ केवल शोभायात्राओं, उत्सवों या औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह दिन आत्मसमीक्षा और आत्मपरिवर्तन का अवसर है। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या हम अपने जीवन में अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और सहिष्णुता के मूल्यों को स्थान दे पा रहे हैं? यदि नहीं, तो महावीर जयंती का उत्सव अधूरा रह जाएगा।
आज विश्व जिस प्रकार हिंसा, असहिष्णुता और विभाजन की प्रवृत्तियों से जूझ रहा है, उसमें भगवान महावीर की शिक्षाएँ मानवता के लिए आशा का संदेश देती हैं। उनका दर्शन हमें बताता है कि विविधता में सहअस्तित्व संभव है और मतभिन्नता के बावजूद संवाद और समन्वय का मार्ग अपनाया जा सकता है। अनेकांत का सिद्धांत आज के वैश्विक समाज के लिए अत्यंत उपयोगी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
समाज में बढ़ती विखंडन की प्रवृत्तियों और नैतिक संकट के इस दौर में आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल महावीर का स्मरण न करें, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का प्रयास करें। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, लोभ, अहंकार और हिंसा पर विजय प्राप्त करने का संकल्प ले, तो समाज में स्वतः ही शांति, सद्भाव और नैतिकता का वातावरण निर्मित हो सकता है।
इसलिए महावीर जयंती का संदेश स्पष्ट है—अपने भीतर के महावीर को जगाइए। अपने विचारों को उदात्त बनाइए, अपने आचरण को पवित्र कीजिए और जीवन को मानवीय मूल्यों से आलोकित कीजिए। यही भगवान महावीर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही समाज तथा राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला भी।
— डॉ. सुनील जैन ‘संचय’
ललितपुर













