भारतीय संस्कृति के आद्य शिल्पकार थे तीर्थंकर ऋषभदेव

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भारतीय संस्कृति के आद्य शिल्पकार थे तीर्थंकर ऋषभदेव
( जैनधर्म के प्रवर्तक ऋषभदेव जन्मकल्याणक (12 मार्च 2026) पर विशेष आलेख)
— डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर
चैत्र कृष्ण नवमी का पावन दिवस जैन परम्परा में अत्यन्त श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसी पुण्यतिथि को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव, जिन्हें आदिनाथ एवं वृषभदेव भी कहा जाता है, का जन्म हुआ था। उनका जन्म केवल एक महापुरुष का जन्म नहीं, अपितु मानव सभ्यता के नवयुग का शुभारम्भ था।
धर्म, करुणा और ज्ञान का प्रकाश – अयोध्या नगरी में महाराजा नाभिराय एवं माता मरुदेवी के आँगन में चैत्र कृष्ण नवमी के दिन ऐसे तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जो मति, श्रुत और अवधिज्ञान से सम्पन्न था। इन्द्रों द्वारा सुमेरु पर्वत पर भव्य अभिषेक के पश्चात उनका नाम ‘ऋषभ’ रखा गया।
चौबीस तीर्थंकरों की परम्परा में जहाँ ऋषभदेव प्रथम स्थान पर विराजमान हैं, वहीं अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी हैं। यह परम्परा जैन दर्शन की शाश्वतता और निरन्तरता का प्रतीक है।
मानव सभ्यता के शिल्पकार – तीर्थंकर ऋषभदेव को भारतीय संस्कृति का आद्य प्रवर्तक माना जाता है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में प्राप्त उनके उल्लेख इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि उन्होंने मानव समाज को सुव्यवस्थित जीवन की दिशा दी।
कल्पवृक्षों के क्षीण होते प्रभाव के समय, जब मानव जीवन असहाय होने लगा, तब ऋषभदेव ने समाज को असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प—इन षट्कर्मों का उपदेश दिया।
उन्होंने मनुष्य को आत्मरक्षा और सामाजिक सुरक्षा,
लेखन एवं ज्ञानार्जन, कृषि द्वारा अन्न उत्पादन, व्यापार एवं आर्थिक संतुलन तथा कला व शिल्प द्वारा सभ्यता निर्माण का मार्ग दिखाया।
इस प्रकार ऋषभदेव केवल धर्मगुरु नहीं, बल्कि मानव जीवन के महान योजनाकार थे।
वैराग्य और मोक्ष का आदर्श-राजपाट, वैभव और ऐश्वर्य का त्याग कर ऋषभदेव ने संयम और तपस्या का मार्ग अपनाया। उनका जीवन इस बात का संदेश देता है कि भौतिक सुख क्षणिक हैं, जबकि आत्मकल्याण शाश्वत है। माघ कृष्ण चतुर्दशी को कैलाश पर्वत पर उनका निर्वाण हुआ—जो आत्मिक उत्कर्ष की चरम अवस्था का प्रतीक है।
भरत, बाहुबली और सांस्कृतिक विरासत -उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर ही इस आर्यावर्त का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। दूसरे पुत्र बाहुबली का तपोयोग अद्वितीय है। एक वर्ष तक अडिग ध्यान मुद्रा में स्थित बाहुबली की विराट प्रतिमा श्रवणबेलगोला में आज भी विश्व को अहिंसा और तपस्या का संदेश देती है। ऋषभदेव ने अपनी पुत्रियों ब्राह्मी और सुन्दरी को लिपि एवं अंकगणित का ज्ञान प्रदान किया, जिससे आगे चलकर ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ।
वैदिक साहित्य और लोकमानस में ऋषभदेव-ऋषभदेव इतिहास की सीमाओं से परे, प्रागैतिहासिक युग के महापुरुष हैं। ऋग्वेद जैसे प्राचीन ग्रन्थों में भी उनका आदरपूर्वक स्मरण मिलता है। यह दर्शाता है कि उनकी महत्ता केवल जैन परम्परा तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय चेतना में व्याप्त है।
भक्ति साहित्य में अमर प्रतिष्ठा-जैन भक्ति साहित्य में सर्वप्रथम वंदना भगवान ऋषभदेव की ही होती है। सातवीं शताब्दी में आचार्य मानतुंग द्वारा रचित भक्तामर स्तोत्र आज भी श्रद्धालुओं का कण्ठहार है। यह स्तोत्र उनकी महिमा, करुणा और दिव्यता का अनुपम काव्यात्मक प्रतिपादन है।
आज के युग में ऋषभदेव की प्रासंगिकता-आज का युग भोगप्रधान है—जहाँ मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन और नैतिक संकट गहराते जा रहे हैं। ऐसे समय में ऋषभदेव की योगप्रधान, संयमित और नैतिक जीवन-शैली मानवता के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है।
उन्होंने जिस समाज व्यवस्था की कल्पना की, उसकी नींव अध्यात्म, नैतिकता और करुणा पर आधारित थी। यदि आज हम उनके सिद्धान्तों को सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आत्मसात करें, तो वैश्विक स्तर पर संतुलन और शान्ति की स्थापना सम्भव है।
जन्मकल्याणक : श्रद्धा और उल्लास का पर्व
प्रतिवर्ष ऋषभदेव जन्मकल्याणक जैन समाज द्वारा श्रद्धा, भक्ति और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक-शान्तिधारा, शोभायात्राएँ, प्रवचन, संगोष्ठियाँ तथा सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। जन्मभूमि अयोध्या में विशेष अनुष्ठान सम्पन्न होते हैं, जो इसे जैन परम्परा का शाश्वत तीर्थ सिद्ध करते हैं।
तीर्थंकर ऋषभदेव का अवदान इतना व्यापक और गहन है कि उसे केवल धार्मिक परिप्रेक्ष्य में सीमित नहीं किया जा सकता। वे भारतीय संस्कृति के शिल्पकार, समाज के मार्गदर्शक और मानवता के महान उपासक थे। उनकी शिक्षाएँ युगों तक मानव समाज को दिशा देती रहेंगी।
-डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर
9793821108

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