भगवान महावीर प्राणीमात्र के अंतरंग में -आचार्य निर्भयसागर
पद और प्रतिष्ठा का अभिमान स्वयं को नीचे गिराता है
मुरैना (मनोज जैन नायक) भगवान महावीर स्वामी ने कहा कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं, अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं ! महावीर स्वामी ने हमें जो सूत्र प्रदान किए उन्हें जीवन में उतारने पर आत्मबल और संयम की प्राप्ति होती है । उन्होंने कहा पतित को पावन बनाना, अज्ञानी को ज्ञानी बनाना, शैतान को इंसान बनाना और इंसान को परमात्मा बनाना ही हमारा मूल ध्येय होना चाहिए । उन्होंने अपने उपदेशों के माध्यम से हमें शिक्षा दी है कि टांग खींचने का नहीं बल्कि हमें हाथ पकड़ कर खींचने का, ऊपर उठाने का कार्य करना चाहिए । हम सभी भगवान महावीर के अनुयायी होकर भी गलतियों पर गलतियां करते जा रहे हैं। हमने महावीर को मंदिरों में कैद कर दिया है । हम महावीर को मंदिरों में, चौराहों पर, तीर्थ क्षेत्रों पर और जंगलों में खोज रहे है, जबकि भगवान महावीर हमारी आत्मा में बसे हैं । आप अपने अंतरंग में झांक कर देखिए, आपको महावीर मिल जायेंगे। उक्त उद्गार जैनाचार्य वैज्ञानिक संत आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ने भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव के अवसर पर बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए ।
आचार्यश्री ने बताया कि भगवान महावीर ने भारत भूमि की पवित्र धरा पर जन्म लेकर, इसी धरती पर विचरण करते हुए सम्पूर्ण प्राणी मात्र को सत्य अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का उपदेश देकर कण कण को पवित्र किया है । उन्होंने कहा -“जियो और जीने दो सबको, यही रहा मेरा संदेश, दया प्रेम को धारण करना, चाहे तेरा होय कोई भेष ।”
आचार्यश्री ने संस्थाओं के पदाधिकारियों को दी नसीहत
पद और प्रतिष्ठा का अभिमान समाज में अहंकार, भेदभाव और सामाजिक दूरी पैदा करता है, जिससे सहयोग और आपसी भाईचारा नष्ट हो जाता है। यह अहंकार प्रतिभा का दमन करता है और व्यक्ति को यथार्थ से दूर कर देता है। सच्चा सम्मान पद से नहीं, बल्कि व्यवहार से मिलता है । पद प्रतिष्ठा अभिमान अंततः पतन का कारण बनता है। समाज में अथवा संस्थाओं में उच्च पद पर बैठे व्यक्ति जब अभिमान करते हैं, तो वे दूसरों को समान सम्मान देने में विफल रहते हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ता है। अत्यधिक प्रतिष्ठा की चाह में व्यक्ति अक्सर बेहतर और रचनात्मक अवसरों को खो देता है। सामाजिक असमानता में वृद्धिः प्रतिष्ठा का लोभ समाज में धन और शक्ति के आधार पर पदानुक्रम बनाता है, जो असमानता को बढ़ावा देता है। अभिमान से भरा व्यक्ति खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, जिससे अपनों से ही रिश्ते खराब हो जाते हैं। पद और प्रतिष्ठा पर अहंकार नहीं करना चाहिए । पद अस्थायी है और यह केवल जिम्मेदारी लाता है, अभिमान नहीं। एक स्वस्थ समाज के लिए प्रतिष्ठा से अधिक मानवीय गरिमा और व्यवहार का सम्मान महत्वपूर्ण है।
“सब जीवों से मैत्री का व्यवहार करो,
घर आये शत्रु से भी प्रेम का व्यवहार करो”
पुस्तकों का हुआ विमोचन
जैनाचार्य वैज्ञानिक संत आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज द्वारा लिखित चार पुस्तक मानवीय कर्तव्य और जैन धर्म, गुरु प्रसाद, जीवन परिचय, अतीत के पन्ने का विमोचन अतिशय क्षेत्र टिकटोली के अध्यक्ष राजेंद्र भंडारी, उद्योगपति पवन जैन, अभिषेक जैन टीटू एवं बाबूलाल जैन द्वारा किया गया । एकलव्य यूनिवर्सिटी द्वारा मानवीय कर्तव्य और जैन धर्म पुस्तक को अपने सिलेबर्स में सम्मिलित कर लिया गया है ।
आचार्य संघ का सिहोनिया के लिए मंगल विहार
जैनाचार्य वैज्ञानिक संत आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ससंघ भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक महोत्सव में सान्निध्य प्रदान करने के पश्चात सिहोनिया जी के लिए मंगल विहार हो रहा है । पूज्य गुरुदेव अतिशय क्षेत्र सिहोनिया, अम्बाह, पिनाहट, शौरीपुर बटेश्वर, शिकोहाबाद, फिरोजाबाद होते हुए टूंडला में श्री पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हेतु 10 अप्रैल को भव्य मंगल प्रवेश करेंगे ।













