30 मार्च
भगवान महावीर का जन्म कल्याणक महोत्सव
भगवान महावीर की शिक्षाएं एवं पर्यावरण
“परस्परोपग्रहो जीवानाम्”
डॉ यतीश जैन
भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और अहिंसक सहअस्तित्व की जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिपादित होती हैं। महावीर जन्मकल्याणक महोत्सव के पावन अवसर पर जब हम उनके जीवन और उपदेशों का स्मरण करते हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि उनका दर्शन आज के पर्यावरण संकट से जूझती मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक और मार्गदर्शक है। जैन परंपरा के प्रमुख ग्रंथ आचार्य उमास्वामी कृत तत्त्वार्थसूत्र, आचार्य कुंदकुंददेव कृत समयसार, पंचास्तिकाय, आचार्य अमृतचंद्र कृत पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, तथा आचार्य पुझ्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि- इन सभी में महावीर की शिक्षाओं का दार्शनिक एवं व्यावहारिक स्वरूप विस्तार से मिलता है।
महावीर जन्मकल्याणक केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक चेतना का पर्व है, जो हमें उनके द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत और संयम जैसे सिद्धांतों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। तत्त्वार्थसूत्र का प्रसिद्ध सूत्र:-
“परस्परोपग्रहो जीवानाम्” (5.21)
इस अवसर पर विशेष रूप से स्मरणीय है, क्योंकि यह हमें बताता है कि समस्त जीव एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यही सिद्धांत आधुनिक पर्यावरण विज्ञान का आधार है। जब हम जन्मकल्याणक मनाते हैं, तो यह केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रहकर इस विचार को भी आत्मसात करने का अवसर होना चाहिए कि पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और वनस्पति- ये सभी जीव हैं और इनके प्रति हमारा व्यवहार अहिंसात्मक होना चाहिए।
इसी ग्रंथ में कहा गया है:-
“पृथिव्यापस्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः”
(तत्त्वार्थसूत्र 2.13)
अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति भी जीव हैं। महावीर जन्मकल्याणक के अवसर पर यदि इस सूत्र को व्यवहार में उतारा जाए, तो पर्यावरण संरक्षण अपने आप एक धार्मिक कर्तव्य बन जाता है। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण—ये सभी केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि अहिंसा के प्रत्यक्ष रूप हैं।
आचार्य कुंदकुंददेव कृत समयसार में कहा गया है:-
“रागादयो हि संसारः”
अर्थात् राग, लोभ और आसक्ति ही संसार के बंधन का कारण हैं।
जन्मकल्याणक के महोत्सव में जब हम भगवान महावीर के वैराग्य और त्याग का स्मरण करते हैं, तब यह भी समझना आवश्यक है कि आज का पर्यावरण संकट कहीं न कहीं मानव के असीमित उपभोग और संग्रह की प्रवृत्ति का परिणाम है। यदि हम अपरिग्रह को अपनाएँ, तो संसाधनों का संतुलित उपयोग संभव हो सकेगा।
आचार्य अमृतचंद्र कृत पुरुषार्थसिद्ध्युपाय का सूत्र:
“प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा”
(गाथा 44)
यह बताता है कि असावधानी से भी जीवों को कष्ट पहुँचाना हिंसा है। आज के संदर्भ में प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग, जल और वायु का प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग – ये सभी प्रमादजन्य हिंसा के उदाहरण हैं। महावीर जन्मकल्याणक का वास्तविक संदेश यही है कि हम अपने जीवन में सजगता लाएँ और ऐसे आचरण से बचें जो प्रकृति को हानि पहुँचाते हैं।
पंचास्तिकाय में जीवों की स्वतंत्र सत्ता और उनके अस्तित्व का सम्मान करने की बात कही गई है। यह सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का भाव रखना चाहिए।
जन्मकल्याणक के अवसर पर यदि यह भावना विकसित हो जाए, तो पर्यावरण संरक्षण केवल एक कार्यक्रम न रहकर जीवन का हिस्सा बन सकता है। भगवान महावीर का जीवन स्वयं इस बात का उदाहरण है कि सरलता, संयम और अहिंसा के माध्यम से ही सच्ची प्रगति संभव है। आज जब हम जन्मकल्याणक महोत्सव को धूमधाम से मनाते हैं, तब यह भी आवश्यक है कि हम इसे “हरित उत्सव” के रूप में मनाने का संकल्प लें – जैसे प्लास्टिक मुक्त आयोजन, वृक्षारोपण, जल संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता अभियान। यही भगवान महावीर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अतः कहा जा सकता है कि भगवान महावीर का जन्मकल्याणक केवल उनके अवतरण का उत्सव नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों को पुनः जागृत करने का अवसर है। दिगंबर ग्रंथों में प्रतिपादित अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और परस्पर सहयोग के सिद्धांत आज के पर्यावरण संकट का स्थायी समाधान प्रस्तुत करते हैं। यदि हम इस अवसर पर इन शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात कर लें, तो न केवल व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर परिवर्तन संभव है, बल्कि पृथ्वी को भी संतुलित और सुरक्षित बनाया जा सकता है। यही महावीर जन्मकल्याणक का वास्तविक संदेश और उद्देश्य है।












