*बांसवाड़ा में ‘तप के महासागर’ का शंखनाद: आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी का भव्य मंगल प्रवेश
* अजीत कोठिया डडूका
बांसवाड़ा। वागड़ की पवित्र धरा पर रविवार को अध्यात्म और तपस्या का अनूठा संगम देखने को मिला। भारत गौरव, अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने अपने 16 पिच्छी ससंघ के साथ बाहुबली कॉलोनी स्थित सुमतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में भव्य मंगल प्रवेश किया। गुरुदेव की एक झलक पाने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा।
सांस्कृतिक छटा और भक्ति का उल्लास शोभायात्रा का शुभारंभ कुशलबाग से हुआ, जहाँ से श्रावक गुरुदेव की अगवानी करते हुए उन्हें बाहुबली कॉलोनी तक लाए। इस दौरान पूरा मार्ग भक्ति के रंगों में सराबोर नजर आया: महिला मंडल की सदस्याएं माथे पर मंगल कलश लिए चल रही थीं बाहुबली बहू मंडल की महिलाओं ने विशेष ड्रेस कोड में मनमोहक नृत्य कर समां बांध दिया वागड़ के स्थानीय आदिवासी कलाकारों ने हाथों में तलवार और पैरों में घुंघरू बांधकर पारंपरिक नृत्य किया, जो आकर्षण का केंद्र रहा। पुरुष वर्ग सफेद वस्त्रों में और सुमतिनाथ नवयुवक मंडल अपनी विशिष्ट पोशाकों में अनुशासन के साथ शोभायात्रा की शोभा बढ़ा रहे थे।
पुष्प वर्षा और जयकारों से गूंजा गगन
जैसे ही संघ बाहुबली कॉलोनी के मुख्य द्वार पर पहुँचा, समाज के पदाधिकारियों द्वारा गुरुदेव का पाद प्रक्षालन कर उन्हें कॉलोनी में प्रवेश का न्योता दिया गया। पूरे मार्ग में भक्तों ने पुष्प वर्षा की और ‘आचार्य श्री के जयघोष’ से वातावरण गुंजायमान हो उठा।
प्रवचन: “बदलाव के बिना धर्म अधूरा”
सुमतिनाथ जिनालय में दर्शन के पश्चात गुरुदेव पंडाल पहुंचे, जहां महेंद्र जी वोरा परिवार द्वारा पाद प्रक्षालन का सौभाग्य प्राप्त किया गया। सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने जीवन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को सरल शब्दों में समझाया:
> “नदी को देखने से शीतलता मिल सकती है, प्यास नहीं बुझती। उसके लिए झुकना पड़ेगा और श्रम करना पड़ेगा। दुनिया की सबसे सुंदर कृति आप स्वयं हैं, खुद को समझें। यदि धर्म करने के बाद भी जीवन में परिवर्तन नहीं आया, तो उस धर्म का कोई अर्थ नहीं है। हमारा देश राग का नहीं, वैराग्य का स्वागत करता है।”
> अद्भुत तपस्या के धनी हैं गुरुदेव समाज के प्रवक्ता महेंद्र कवालिया ने बताया कि बांसवाड़ा की धरा पर पहली बार ऐसा तपस्वी संघ आया है। आचार्य श्री की तपस्या कठिन है—वे एक दिन छोड़कर एक दिन आहार ग्रहण करते हैं। उन्होंने सम्मेद शिखर जी में 32 दिन और 16 दिन के अंतराल पर आहार लेकर कठिन तप किया है। मंच का सफल संचालन शैलेंद्र दोषी द्वारा किया गया। इस ऐतिहासिक मंगल प्रवेश ने संपूर्ण बांसवाड़ा जैन समाज को भक्ति और संयम के सूत्र में पिरो दिया है।

















