बदलते समय में बिखरते पारिवारिक मूल्य—एक मूक संकट
डॉ. सुनील जैन ‘संचय’
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वर्तमान युग की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जितना मनुष्य बाहरी दुनिया से जुड़ रहा है, उतना ही वह अपने ही घर-आँगन से दूर होता जा रहा है। संबंधों की ऊष्मा, संवाद की सहजता और संस्कारों की गहराई—ये सब मानो समय की तेज़ आँधी में धुँधले पड़ते जा रहे हैं। परिवार, जो कभी मनुष्य के व्यक्तित्व का पहला और सबसे सशक्त आधार था, आज कई स्थानों पर केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह गया है।
नई पीढ़ी, जिसे हम आधुनिक, आत्मनिर्भर और जागरूक कहते हैं, अपने भीतर अपार संभावनाएँ समेटे हुए है। उसमें अपने निर्णय स्वयं लेने का साहस है, अपनी राह स्वयं गढ़ने का आत्मविश्वास है। किन्तु इसी आत्मविश्वास के साथ एक सूक्ष्म अहं भी पनपता दिखाई देता है—एक ऐसा भाव, जो अनुभव से अधिक तात्कालिक ज्ञान को महत्व देता है। परिणामस्वरूप, माता-पिता का स्थान मार्गदर्शक से बदलकर मात्र ‘सुविधा प्रदाता’ तक सीमित होता जा रहा है।
कभी परिवार केवल साथ रहने का स्थान नहीं था; वह जीवन का गुरुकुल था। वहाँ माता-पिता अपने अनुभवों की रोशनी से बच्चों के मार्ग को आलोकित करते थे। उनकी डाँट में भी स्नेह होता था और उनके मौन में भी गहरी सीख छिपी होती थी। उस समय ‘संस्कार’ कोई उपदेश नहीं, बल्कि जीवन की सहज धारा थे, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होती थीं।
परन्तु आज, जब जीवन की गति असाधारण रूप से तेज़ हो गई है, तब संबंधों की गहराई कहीं पीछे छूटती जा रही है। डिजिटल दुनिया ने हमें सूचना तो दी है, परंतु संवेदना छीन ली है। परिवार के सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अपने-अपने एकांत में कैद हैं। संवाद का स्थान स्क्रीन ने ले लिया है और अनुभव का स्थान तात्कालिक प्रतिक्रियाओं ने।
युवा पीढ़ी अपने निर्णय स्वयं लेना चाहती है—यह उसका अधिकार भी है। किन्तु जब यह स्वतंत्रता मार्गदर्शन से कट जाती है, तब वह दिशा खोने लगती है। अनुभव की कमी को अक्सर आत्मविश्वास ढक लेता है, और तब जीवन की छोटी-सी ठोकर भी बड़ी पीड़ा बन जाती है। यही वह क्षण होता है, जब व्यक्ति को अहसास होता है कि माता-पिता केवल सलाह देने वाले नहीं, बल्कि जीवन के सबसे सच्चे संरक्षक होते हैं।
दूसरी ओर, माता-पिता को भी यह स्वीकार करना होगा कि समय बदल चुका है। पुरानी मान्यताओं को ज्यों का त्यों थोपना अब संभव नहीं। उन्हें अपने अनुभवों को आदेश के रूप में नहीं, बल्कि संवाद के रूप में प्रस्तुत करना होगा। जब संबंधों में संवाद जीवित रहता है, तभी विश्वास और अपनापन बना रहता है।
वास्तव में, समस्या न तो केवल युवा पीढ़ी में है और न ही केवल पुरानी पीढ़ी में। यह उस संतुलन के टूटने की समस्या है, जो कभी दोनों के बीच सहज रूप से विद्यमान था। जब परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी न होकर पूरक बनती हैं, तभी एक स्वस्थ और सशक्त समाज का निर्माण होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम परिवार को पुनः ‘संस्कारों के केंद्र’ के रूप में स्थापित करें। बच्चों को केवल सुविधाएँ ही नहीं, बल्कि समय, संवाद और स्नेह भी दें। और युवा पीढ़ी भी यह समझे कि अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता—वह केवल सुना नहीं, जिया जाता है।
अंततः, परिवार एक वृक्ष की भाँति है—जिसकी जड़ें संस्कार हैं, तना विश्वास है और शाखाएँ संबंध। यदि जड़ें कमजोर हों, तो वृक्ष कितना भी ऊँचा क्यों न हो, वह टिक नहीं सकता। इसलिए आवश्यक है कि हम आधुनिकता की उड़ान भरते हुए भी अपनी जड़ों को न भूलें, क्योंकि वही हमें स्थिरता और पहचान प्रदान करती हैं।












