अनुष्ठानों की सफलता के लिए मन की विशुद्धि आवश्यक – आचार्य निर्भयसागर

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अनुष्ठानों की सफलता के लिए मन की विशुद्धि आवश्यक – आचार्य निर्भयसागर

मुरैना (मनोज जैन नायक) धार्मिक आयोजन धार्मिक अनुष्ठान आत्मकल्याण की भावना से ओतप्रोत होते हैं। हम सभी को समय समय पर धार्मिक अनुष्ठान और आयोजन करते रहना चाहिए । हम जब भी कोई धार्मिक अनुष्ठान या आयोजन करते हैं तब हमारे अंतरंग में एक विशेष प्रकार की सुखद अनुभूति होती है । हमारे अंतरंग में आत्मकल्याण की भावना उत्पन्न होती है। ऐसे अनुष्ठान, आयोजन पतित से पावन बनाने के लिए किए जाते हैं, अंतरंग की शुद्धता के लिए किए जाते हैं, विकारों को नष्ट करने के लिए किए जाते हैं, भक्ति और आराधना के लिए किए जाते हैं, पुण्य का संचय करने एवं पापों को नष्ट करने के लिए किए जाते हैं। सभी धर्मों में सभी अनुष्ठानों का उद्देश्य यही रहता है । सही समय पर किया गया सही कार्य ही प्रशंसनीय एवं सराहनीय होता ह । कोई भी अनुष्ठान करते समय मन की विशुद्धि अति आवश्यक है । यदि मन की विशुद्धि होगी तो कार्य की शुद्धि अथवा सफलता स्वमेव ही सुनिश्चित हो जाती है । उक्त उद्गार जैनाचार्य वैज्ञानिक संत आचार्य श्रीनिर्भयसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर मुरैना में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
धर्म सभा का शुभारंभ मंगलाचरण के साथ हुआ । सभा के प्रारंभ में श्रावक श्रेष्ठियों द्वारा पूज्य गुरुदेव का पाद प्रक्षालन कर, शास्त्र आदि भेट किए गए । सभा का संचालन प्रतिष्ठाचार्य पंडित संजय शास्त्री सिहोनिया एवं प्रतिष्ठाचार्य अजय भैयाजी ज्ञापन तमूरा वाले दमोह ने किया ।
आयोजनों में कार्यकर्ताओं की सहभागिता
कार्यकर्ता को सुझाव के साथ सहयोग भी देना चाहिए। एकता बनाए रखना चाहिए समर्पण उत्साह संयम और प्रेम जिस कार्यकर्ता के अंदर होता है वह सबके लिए आदर्श बन जाता है। कार्यकर्ताओं में आपसी मेल मिलाप सहयोग की भावना और एक दूसरे के कार्य की सराहना करने वाला होना चाहिए। सच्चा कार्यकर्ता वही है जो पानी में रेत या तेल की तरह न होकर शक्कर की तरह हो। जैसे पानी में रेत डालने पर नीचे बैठ जाती है वैसे ही कार्यकर्ता बने बनाय मंच पर आकर बैठने वाला ना हो और वीडियो कैमरा के सामने फोटो खिचाने के लिए तेल में पानी की तरह ऊपर ऊपर ना तैरता हो बल्कि पानी में शक्कर की तरह अपना अस्तित्व की परवाह न करते हुए कार्यक्रम में मिठास लाने वाला होना चाहिए।

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