अंतरराष्ट्रीय वेबिनार: वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी गुरुराज की दिव्य वाणी
“पाप से घृणा करो, पापी से नहीं—क्योंकि हर आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति है”।
अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट…..
सिद्धान्त चक्रवर्ती, पूज्य वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी गुरुराज ने शिवगौरी आश्रम से आयोजित वेबिनार में आत्म-श्रद्धा और सम्यक् दृष्टि के गूढ़ रहस्यों को उजागर किया।
✨ अमृत वचन के मुख्य अंश:
🔹 मिथ्यात्व और आत्म-भ्रम:
जो स्वयं को शरीर (काला, गोरा, अमीर या गरीब) मानता है, वह मिथ्यादृष्टि है। यहाँ तक कि मन और वचन को भी ‘मैं’ मानना कुज्ञान है। शरीर को ‘पर’ (अनात्मा) मानना ही आत्मा से परमात्मा बनने का प्रथम सोपान है।
🔹 मोह: सबसे महान पाप:
आचार्य श्री ने बताया कि सप्त व्यसन या पंच पाप न करने वाला व्यक्ति भी ‘मोह’ के कारण भयंकर पाप बाँध सकता है। मोह ही वह कारण है जिससे जीव अनादि काल से निगोद में पड़ा है। सम्यक् दर्शन ही आत्मा का श्रेष्ठतम गुण है, जिसे पाना दुर्लभ है।
🔹 आत्मा की अमरता (आकाश का उदाहरण):
जैसे आकाश को आग नहीं जला सकती, वैसे ही आत्मा के एक भी प्रदेश को कोई जला या नष्ट नहीं कर सकता। हम चैतन्य तत्व हैं, जो अविनाशी है।
🚩 गहन बोध एवं प्रेरक दृष्टिकोण (Insightful Wisdom):
📍 १. साधु की अलौकिक वृत्ति:
“सामान्य लोग अक्सर महापुरुषों को गलत समझते हैं क्योंकि साधुओं के विचार और क्रियाएँ लोक-व्यवहार से बहुत उच्च और विपरीत होती हैं। स्वयं तीर्थंकर आदिनाथ को उनके पोते मरीचि ने गलत समझा था, पर वही मरीचि शेर की पर्याय में सम्यक् दृष्टि प्राप्त कर महावीर बना। अतः निंदा की परवाह किए बिना गुणों के मार्ग पर बढ़ते रहना चाहिए।”
📍 २. पापी के प्रति करुणा और आशीर्वाद:
“मुनिश्री सुदत्त सागर जी की जिज्ञासा पर गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि पापी जीवों को ही आशीर्वाद की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। आगम में मेंढक को ‘महात्मा’ और चांडाल को भी ‘पुण्य-वृद्धि’ का आशीर्वाद दिया गया है। पापी की निंदा करने वाला स्वयं दुर्गति में जाता है। क्या पता, वह पापी गुरु-सान्निध्य पाकर हमसे पहले भगवान बन जाए!”
📍 ३. ‘णमो लोए सव्वसाहुणं’ का व्यापक अर्थ:
“इस महामंत्र में उन भव्य आत्माओं को भी नमस्कार है जो आज नरक या निगोद में हैं, पर भविष्य में पंच परमेष्ठी बनेंगे। जैसे श्रेणिक राजा अभी नरक में हैं, पर भावी तीर्थंकर हैं। शुद्ध दृष्टि से देखें तो हर जीव में अरिहंत और सिद्ध विराजमान है।”
🔹 गुणग्राहकता (भरत चक्रवर्ती का उदाहरण):
३२,००० राजाओं के अधिपति होने के बाद भी भरत चक्रवर्ती ने सामान्य राजा श्रेयांस के दान की प्रशंसा की। हमें ‘गुणग्राही’ बनना चाहिए। किसी में हजारों दोष हों, पर यदि एक गुण है, तो उसे ही देखना चाहिए। गुणगान से ही हमें भगवान के गुण प्राप्त होते हैं।
🔹 प्रिय बनाम श्रेय:
भोग-उपभोग ‘प्रिय’ हो सकते हैं, पर वे ‘श्रेय’ (कल्याणकारी) नहीं हैं। आत्मा को परमात्मा बनाना ही एकमात्र ‘श्रेय’ मार्ग है।मंगलाचरण (मुनिश्री सुविज्ञ सागर जी द्वारा):
“बच्चों! तुम निर्माता हो—भावी भाग्य के, स्वयं के विकास के और राष्ट्र निर्माण के।”मंगल भावना: हम गुणग्राही बनें और हर जीव में परमात्मा के दर्शन करे। ये जानकारी विजय लक्ष्मी गोदावत ने दी।














